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सांध्यकालीन पाठ्यक्रम

सामान्यत: देश के विश्वविद्यालयों में हिंदी के जो स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रम चल रहे हैं, उनमें साहित्य-शिक्षण ही प्रमुख रहता है और उनमें भाषा के अध्ययन-अध्यापन की उपेक्षा होता रहती है, जिसके कारण विद्यालयों में हिंदी भाषा के शिक्षण के विविध प्रकार के शैक्षिक कार्यक्रमों में हिंदी के स्नातक आदि प्रभावी नही हो पाते। इसी दृष्टि से सत्तर के दशक में 'केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल' के तत्कालीन अध्यक्ष श्री मोटूरि सत्यनाराण ने 'प्रयोजनमूलक हिंदी' के अध्ययन-अध्यापन की नयी पहल की और हर जगह प्रयोजनमूलक भाषापरक पाठ्यक्रमों को चलाने के विचार का स्वागत हुआ।

श्री मोटूरि जी की प्रेरणा से केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक स्व. डॉ. गोपाल शर्मा तथा स्व. डॉ रवीनद्रनाथ श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक अखिल विचार गोष्ठी का आयोजन, दिल्ली केंद्र द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी के सभागार में किया गया, जिसमें देश के विभिन्न विश्वद्यिालयों, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् एनसीईआरटी, केंद्रीय हिंदी निदेशानलय आदि संस्थाओं के विशेषज्ञों ने भाग लिया। बाद में इस विचार गोष्ठी में पढ़े कए प्रपत्रों को संस्थान द्वारा 'प्रयोजनमूलक हिंदी' के नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया।

दिल्ली केंद्र के तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक (स्व.) रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने 1974-75 में 'पोस्ट एम. ए., अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान डिप्लोमा' नामक एक सांयकालीन पाठ्यक्रम का शुभारंभ किया था। यद्यपि इस पाठ्यक्रम को चलाने के लिए स्टाफ या बजट का प्रावधान नहीं था, फिर भी अध्यापाकों ने अतिरिक्त समय देकर इसे चलाने का संकल्प किया। यह पाठ्यक्रम स्व-वित्ती आधार पर प्रारंभ किया गया था और कई वर्षों तक इसी प्रकार स्वत: प्रेरित कार्यक्रम के रूप में चलता रहा। यह पाठ्यक्रम आज तक दिल्ली केंद्र में नियमित रूप से चल रहा है। पिछले 34 वर्षों में इस पाठ्यक्रम में दिल्ली तथा आस-पास के क्षेत्रों के अनेक प्रतिभागी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं और कर रहे हैं।

प्रयोजनमूलक हिंदी के संदर्भ में भारत सरकार के हिंदी अनुवादकों और अधिकरियों उपयोगार्थ वर्ष 1980 से अनुवाद' सिद्घांत और व्यवहार डिप्लोमा का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। पहले वर्ष इस पाठ्यक्रम में 130 आवेदनकर्ता थे और सिर्फ 40 लोगों के प्रवेश मिल सका था पिछले तीस वर्षों से दिल्ली केंद्र में इस कार्यक्रम में अनेक प्रतिभागी प्रशिक्षित हो चुके हैं और अभी भी प्रशिक्षित हो रहे हैं।

इन दोनों पाठ्यक्रमों की यह विशेषता है कि सेवारत प्रतिभागियों के पदोन्नति के अवसर मिले इसीलिए इन पाठ्यक्रमों में दी गयी विविध क्षेत्रों में नौकरी मिली हैं। रोजगारपरक होने के कारण इन पाठ्यक्रमों में प्रवेशार्थियों की माँग बढती गई परंतु केंद्र की अपनी सीमा थी। अत: अधिक व्यक्तियों को प्रवेश नही दिया जा सकता था। अनुवाद डिप्लोमा की सफलता तथा उसमें प्रवेश के लिए आने वाले छात्रों की संख्या को देखते हुए दिल्ली स्थित अनेक संस्थाओं, जैसे- भारती विद्या भवन, मैक्सम्यूलर भवन तथा अनुवाद परिषद् आदि ने संस्थान के पाठ्यक्रम से प्रेरणा लेकर अपने-अपने कार्यक्रम को प्रारंभ कर दिया।

इन सांध्यकालीन डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की सफलता को देखते हुए केंद्र ने 'अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान उच्च डिप्लोमा' का कार्यक्रम प्रारंभ किया, परंतु प्रतिभागियों की पर्याप्त संख्या न होने के कारण इस पाठ्यक्रम को कुछ वर्षों के बाद बंद करना पड़ा।

प्रयोजनमूलक हिंदी का एक और प्रमुख क्षेत्र है 'पत्रकारिता' । दिल्ली केंद्र में 'हिंदी पत्रकारिता' का एक डिप्लोमा पाठ्यक्रम वर्ष 2002 में प्रारंभ किया गया। यह कार्यक्रम बहुत सफल रहा है और अब तक 8 वर्ष में इसमें अनके प्रतिभागी प्रशिक्षित हो चुके हैं। दिल्ली केंद्र में वर्ष 2006 में 'प्रूफ रीडिंग और मुद्रण डिप्लोमा' का पाठ्यक्रम भी प्रारंभ किया गया था, परन्तु किन्ही कारणों से यह कार्यक्रम दो वर्ष ही चला।