बुधवार, अप्रै 24

  •  
  •  
आप यहाँ हैं:घर क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली केंद्र शैक्षणिक गतिविधियाँ विदेशी हिंदी शिक्षण कार्यक्रम

विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण कार्यक्रम

केंद्रीय हिंदी संस्थान ने जब दिल्ली केंद्र स्थापति किया तो दिल्ली में स्थित विदेशी दूतावासों, उच्चायोगों और विदेशी नागरिकों से यह माँग आने लगी कि हिंदी भाषा का व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए अपयुक्त पाठ्यक्रम चलाए जाएँ। अत: संस्थान ने निर्णय लिया कि दिल्ली केंद्र में विदेशियों के लिए संध्याकालीन पाठ्यक्रम शुरू किए जाएँ। विदेशी नागरिकों को हिंदी सिखाने के लिए पहला पाठ्यक्रम प्रायोगिक स्तर पर 1971 में शुरू किया गया। पहले वर्ष छह महीने के इस कार्यक्रम में छह प्रतिभागियों ने भाग लिया।

इस कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए शिक्षा मंत्रालय को विधिवत रूप से विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण कार्यक्रम चलाने का सुझाव दिया। भारत सरकार के विदेशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रमों के अंतर्गत 'भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्' के सौजन्य से पहले वर्ष फिजी, ट्रिनिडाड़ और सूरीनाम से तीन प्रतिभागी एक वर्ष पंचवर्षीय योजना में 'विदेशों में हिंदी प्रसार' नामक योजना का प्रस्ताव दिया था। शिक्षा-मंत्रालय ने इस योजना को स्वीकृति दी और यह विधिवत्र रूप से पंचवर्षीय योजना का अंग बन गया। विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण का यह कार्यक्रम 1970 से आज तक चला आ रहा है। और पूरे विश्व में इसकी मान्यता है। इसमें शुरू में भारत सरकार से छात्रवृत्ति पाने वाले प्रतिभागी ही प्रवेश पाते थें, लेकिन बाद में इसमें अन्य कोटियों के व्यक्ति भी प्रवेश लेने लगे यथा

(1) स्ववित्तीय आधार पर हिंदी सीखने के लिए आने वाले प्रतिभागी

(2) विभिन्न राष्ट्रों के साथ भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान की संधियों के अंतर्गत आने वाले प्रतिभागी और

(3) अपने अपने विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की माँग की संदर्भ में हिंदी में आवश्यक ग्रेड अर्जित करने के लिए आने वाले छात्र

(4) इनके अतिरिक्त विभिन्न विश्वविद्यालयों से वरिष्ठ प्राध्यापक अपने अनुसंधान कार्यों के लिए संस्थान में आते रहते हैं।

विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षित होने वाले अनेक प्रतिभागी पाठ्यक्रम को सफलता पूर्वक पूरा करने के बाद अपने अपने देशों मे जाकर विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रचार-प्रसार का कार्य कर रहे हैं कुछ लोगों ने अपने देश में हिंदी विभाग की स्थापना की, कुछ लोग रेडियों या दूरदर्शन के कार्यक्रमों के प्रसारण से जुड़े हैं कुछ लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों या विद्यालयों में हिंदी शिक्षण का कार्य कर रहे हैं।

दिल्ली केंद्र में छात्रवृत्ति पर आने वाले प्रतिभागियों के लिए किराए के भवनों में आवास की व्यवस्था करना कठिन होता जा रहा था और मुख्यालय आगरा में छात्रावासों की सुविधा थी, अत: 1993 में छात्रवृत्ति वाले प्रतिभागियों के कार्यक्रम को आगरा स्थानांतरित कर दिया गया।

जब विदेशी हिंदी पाठ्यक्रम का प्रारंभ हुआ था, तब मात्र एक कक्षा की व्यवस्था थी। जब विभिन्न देशों से अलग-अलग स्तर के छात्र आने लगे, तो पूरे कार्यक्रम को प्रमाण पत्र और डिप्लोमा के दो स्तरों में बांटा गया। 1983 में तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक प्रो. एम जी. चतुर्वेदी ने विचार-विमर्श के उपरांत पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप देने की पहल की। उसी समय निम्नलिखित रूप से विदेशियों के चतुर्वर्षीय कार्यक्रम का आयोजन होता आ रहा है:

  • हिंदी दक्षता प्रमाण पत्र ( स्तर 100 )
  • हिंदी दक्षता डिप्लोमा ( स्तर 200 )
  • हिदी दक्षता उच्च डिप्लोमा ( स्तर 300 )
  • स्नातकोत्तर हिंदी डिप्लोमा ( स्तर 400 )

पहले तीन स्तरों के प्रतिभागियों को उनके पूर्वज्ञान के आधार पर निर्धारण-परीक्षण के पश्चात अलग-अलग वर्गों में रखा जाता है। चौथा स्तर अनुवाद, भाषा- शिक्षण आदि अनुप्रयोग के क्षेत्रों में व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए है।

कार्यक्रम की उपयोगिता को देखते हुए इसमें शोधार्थी, हिंदी शिक्षक आदि भी आने लगे, तो उनके लिए पाँचवें स्तर के पाठ्यक्रम दो-तीन वर्ष चलने के बाद यह कार्यक्रम स्थगित हो गया है। इस स्तर के प्रतिभागी शोध कार्य के उपरांत भाषा या साहित्य के किसी विषय पर अपनी शोध परियोजना प्रस्तुत करते हैं। रजत-जयंती-वर्ष के उपलक्ष्य में इन परियोजनाओं के संक्षिप्त विवरणों को ' शोध-सार-सग्रंह' शीर्षक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है।