गुरुवार, जुल 09

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दिल्ली केंद्र

KHS-Delhi

दिल्ली केंद्र की स्थापना वर्ष 1970 में हुई। सर्वप्रथम राजभाषा क्रियान्वयन योजना के लिए केंद्रीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए गहन हिंदी शिक्षण कार्यक्रम और विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार के अंतर्गत विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए। कार्याधिक्य के कारण वर्ष 1993 में विदेशियों के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम की छात्रवृत्ति आधारित योजना आगरा मुख्यालय में स्थानांतरित कर दी गई।

वर्तमान में दिल्ली केंद्र में स्ववित्त पोषित योजना के अंर्तगत विदेशियों के लिए हिंदी पाठ्यक्रम, सांध्यकालीन पोस्ट एम.ए. अनुप्रयुक्त हिंदी भाषाविज्ञान डिप्लोमा, पोस्ट एम.ए. अनुवाद सिद्धांत एवं व्यवहार डिप्लोमा तथा पोस्ट एम.ए. जनसंचार एवं पत्रकारिता पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों के स्कूल एवं कॉलेज स्तर के हिंदी अध्यापकों के लिए 3 से 4 सप्ताह के नवीकरण पाठ्यक्रमों का आयोजन भी दिल्ली केंद्र द्वारा किया जाता है।

स्थापना

भारत सरकार के शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय द्वारा सन् 1961 में केंद्रीय हिंदी संस्थान के शासी निकाय केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की स्थापना की गई थी तथा अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी के शिक्षण प्रशिक्षण और शोध- कार्य के लिए 1963 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की स्थापना की गई थी। 

1970 में संस्थान ने दिल्ली में अपने एक परिसर की स्थापना की, जिसे बाद में दिल्ली केन्द्र के रूप में मान्यता मिली। 1969 में शिक्षा मंत्रालय में भाषा वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई थी, जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि भारत सरकार के वरिष्ठतम अधिकारियों के लिए, विशेष रूप से 'तीन महीने का गहन हिंदी शिक्षण' कार्यक्रम प्रारंभ किया जाए क्योंकि वरिष्ठ अधिकारी अपने कार्यो को छोड़कर हिंदी- शिक्षण योजना की कक्षाओं में जा नही पाते। इस संदर्भ में मंत्रालय ने संस्थान से कहा कि वह इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तीन महीने की अवधि के गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम की योजना प्रस्तुत करे और दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए आवश्यक व्यवस्था करे।


केंद्र पर पदस्थ सदस्य -

शैक्षिक वर्ग -
प्रोफ़ेसर महेंद्र सिंह राणा, क्षेत्रीय निदेशक
डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा (एसो. प्रोफ़ेसर)
डॉ. मंजु राय (एसो. प्रोफ़ेसर)
डॉ. योगेंद्र कुमार (एसो. प्रोफ़ेसर)
डॉ. अपर्णा सारस्वत (एसो. प्रोफ़ेसर)
डॉ. ऋचा गुप्त (असि. प्रोफ़ेसर)

 

लघु हिंदी विश्वकोश परियोजना -
प्रोफेसर इंद्रनाथ चौधरी, प्रधान संपादक (अवै.)
डॉ. अपर्णा सारस्वत, (एसो. प्रोफ़ेसर), परि. प्रभारी
डॉ. पराक्रम सिंह, परियोजना सहायक (अनुबंध)
योगेंद्र सिंह राणा, डा़टा आपरेटर (अनुबंध)
श्री प्रभाकर, कार्मिक (अनुबंध)

पत्रिका प्रकाशन -

डॉ. स्वर्ण अनिल, प्रकाशन सलाहकार (अनुबंध)

सुश्री नम्रता, लिपिक

प्रशासनिक वर्ग - 
आकाश बाबू जैन (कनिष्ठ पुस्तकालय सहायक)
श्रीमती रजनी (कनिष्ठ आशुलिपिक)
श्री योगेंद्र प्रसाद सिंह (लघु श्रेणी लिपिक)
श्री मनवर सिंह बिष्ट (लघु श्रेणी लिपिक)
श्री राजेश कुमार (लघु श्रेणी लिपिक) - मंत्रालय में पदस्थ

श्री कृष्णा कुमार, मान. उपाध्यक्ष के निजी सहायक, को-टर्मिनस)

श्री दलबीर सिंह (वाहन चालक)
श्रीमती मंथा रावत (छात्रावास परिचारिका)
श्रीमती यशोदा रावत (चपरासी)
श्री जगदीश प्रसाद (सफ़ाई कर्मचारी)
श्री शत्रुघ्न महतो (दफ्तरी) -मंत्रालय में पदस्थ
श्री राजेश कुमार (चपरासी) - मंत्रालय में पदस्थ
श्री बीर सिंह (सफ़ाई कर्मचारी) - प्रतिनियुक्ति पर
बलबहादुर थापा (चपरासी) - मंत्रालय में पदस्थ
सुश्री स्नेहलता रावत (चपरासी)


 

केंद्र के प्रकाशन

1- दिल्ली केंद्र द्वारा सम्पन्न कार्यक्रमों के प्रतिवेदना और शिक्षण सामग्री को संस्थान ने पुस्तकाकार प्रकाशित किया है, जो निम्नलिखित हैं-

(क) 'कंप्यूटर संसाधित हिंदी शिक्षण एवं सर्जनात्मक लेखन शिक्षण' प्रो. चतुर्वेदी के संचोजन में आयोजित कार्यशालाओं में विकसित आलेख पाठ आदि।
(ख) 'हिंदी का सामाजिक संदर्भ' का प्रकाशन संस्थान से हुआ था, जिसका संपादन और संकलन तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक (स्व.) रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने दिल्ली केंद्र में किया।
(ग) 'विश्व भारती' नाम से एक वार्षिक पत्रिका प्रकाशित की गई, जिसमें विदेशी छात्रों की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। यह पत्रिका 1988-1990 तक तीन वर्ष चली।
(घ) दिल्ली केंद्र से पिछले तीन साल से पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के उपयोगार्थ 'मीडिया' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। इस समय मीडिया का छठा अंक मुद्रणाधीन है।

हिंदी नवीकरण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

केंद्रीय हिंदी संस्थान के मुख्यालय में तथा बाद में स्थापित अन्य केंद्रो में विस्तार कार्यक्रमों के अतंर्गत विभिन्न क्षेत्रों के हिंदी के अध्यापकों के लिए लघु अवधि के नवीकरण पाठ्यक्रमों का नियमित आयोजन होता आ रहा है।

1985 में जब गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम विधिवत रूप से गृह मंत्रालय के पास चला गया तो दिल्ली केंद्र को पंजाब तथा जम्मू कश्मीर, दो प्रदेशों में नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित करने के लिए प्राधिकृत किया गया।

नवीकरण पाठ्यक्रम सामान्य रूप से तीन सप्ताह की अवधि के होते हैं, जिनमें प्रतिभागी अध्यापकों को भाषा-शिक्षण-विधि, सामग्री-निर्माण कौशल-शिक्षण, मूल्यांकन आदि विषयों में अद्यतन स्थिति से परिचित कराया जाता है और उनसे तत्संबंधी व्यावहारिक कार्य भी कराए जाते हैं दिल्ली केंद्र ने पिछले 25 वर्षों में अब तक पंजाब राज्य के विभिन्न स्थापनों पर तथा जम्मू कश्मीर के लिए जम्मू, श्रीनगर, लेह आदि स्थानों पर पाठ्यक्रम आयोजित किए। इन कार्यक्रमों में अब तक पंजाब तथा जम्मू कश्मीर के हिंदी के अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

शोध कार्यक्रम

संस्थान में शोध और सामग्री निर्माण के कार्य मुख्य रूप से मुख्यालय आगरा में संचालित होते रहे हैं इस दृष्टि से दिल्ली केंद्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
दिल्ली केंद्र में अब तक तीन प्रमुख शोध तथा सामग्री निर्माण की योजनाएँ सम्पन्न हो चुकी है-

  1. दिल्ली केंद्र में लद्दाखी भाषा संबंधी शोध का प्रकोष्ठ अस्सी के दशक में स्थापित हुआ था, जिसमें संयुक्ता कौशल कार्यरत थीं। इस योजना के अंतर्गत जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में भाषा सामग्री का संकलन किया गया और उसके लिप्यंकन के पश्चात लद्दाखी भाषा का विवरणात्मक अध्ययन किया गया। इस परियोजना के अंतर्गत ‘कंवर्सेशनल लद्दाखी' और लद्दाखी ग्रामर' पुस्तक का प्रकाशन हुआ है।
  2. गहन हिंदी शिक्षण कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए गृह मंत्रालय ने संस्थान को डाक तार विभाग के डाकियों को देवनागरी लिपि से परिचित कराने के लिए एक लघु अवधि के पाठ्यक्रम का निर्माण करने का कार्य सौंपा था। दिल्ली केंद्र ने यह पाठ्यक्रम तैयार किया, जिसमें हस्तलिखित पतों को पढने का अभ्यास भी शामिल किया गया था। यह सामग्री गृह मंत्रालय द्वारा प्रकाशित की गयी और पूरे देश में यह पाठ्यक्रम चलाया गया था।
  3. वर्ष 1988-89 में तत्कालीन इलैक्ट्रॉनिक विभाग ने संस्थान के दिल्ली केंद्र को कंप्यूटर द्वारा भाषा शिक्षण के लिए सामग्री निर्माण की परियोजना का कार्य सौंपा था, जिसके संयोजक थे तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक प्रो. मां. गो. चतुर्वेदी। यह सामग्री 'कम्प्यूटर संसाधित हिंदी शिक्षण एवं सर्जनात्मक लेखन शिक्षण' के शीर्षक से 1989 में संस्थान द्वारा प्रकाशित की जा चुकी हैं कंप्यूटर की सहायता से विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण और हिंदी कार्पोरा और कोश निर्माण के लिए संस्थान के दिल्ली केंद्र के तत्कालीन प्रभारी प्रो. मां. गो. चतुर्वेदी ने एक प्रस्ताव भारत सरकार के इलैक्ट्रॉनिक विभाग को अनुदान के लिए प्रेशित किया था। प्रस्ताव के अनुसार यह कार्य दिल्ली के आई आई टी के कंप्यूटर विभाग के साथ मिलकर किया गया था। इसके लिए दस लाख चालीस हजार रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ था। प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद इस परियोजना पर कार्य प्रांरभ किया गया। संस्थान के दिल्ली केंद्र ने 'देवनागरी (वर्ण) शिक्षक' नाम से एक प्रोग्राम विकसित किया है तथा ऐसे ही अन्य मॉड्यूल बनाए हैं, जिनका उपयोग शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों कर सकते हैं।
  4. इस समय दिल्ली केंद्र के पास एक महत्वाकांक्षी शोध परियोजना है 'हिंदी के लघु विश्वकोश का निर्माण' प्रो. इंद्र नाथ चौधरी इस परियोजना के संयोजक हैं। यह कार्य तेजी से आगे बढ रहा है।

सांध्यकालीन पाठ्यक्रम

सामान्यत: देश के विश्वविद्यालयों में हिंदी के जो स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रम चल रहे हैं, उनमें साहित्य-शिक्षण ही प्रमुख रहता है और उनमें भाषा के अध्ययन-अध्यापन की उपेक्षा होता रहती है, जिसके कारण विद्यालयों में हिंदी भाषा के शिक्षण के विविध प्रकार के शैक्षिक कार्यक्रमों में हिंदी के स्नातक आदि प्रभावी नही हो पाते। इसी दृष्टि से सत्तर के दशक में 'केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल' के तत्कालीन अध्यक्ष श्री मोटूरि सत्यनाराण ने 'प्रयोजनमूलक हिंदी' के अध्ययन-अध्यापन की नयी पहल की और हर जगह प्रयोजनमूलक भाषापरक पाठ्यक्रमों को चलाने के विचार का स्वागत हुआ।

श्री मोटूरि जी की प्रेरणा से केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक स्व. डॉ. गोपाल शर्मा तथा स्व. डॉ रवीनद्रनाथ श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक अखिल विचार गोष्ठी का आयोजन, दिल्ली केंद्र द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी के सभागार में किया गया, जिसमें देश के विभिन्न विश्वद्यिालयों, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् एनसीईआरटी, केंद्रीय हिंदी निदेशानलय आदि संस्थाओं के विशेषज्ञों ने भाग लिया। बाद में इस विचार गोष्ठी में पढ़े कए प्रपत्रों को संस्थान द्वारा 'प्रयोजनमूलक हिंदी' के नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया।

दिल्ली केंद्र के तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक (स्व.) रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने 1974-75 में 'पोस्ट एम. ए., अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान डिप्लोमा' नामक एक सांयकालीन पाठ्यक्रम का शुभारंभ किया था। यद्यपि इस पाठ्यक्रम को चलाने के लिए स्टाफ या बजट का प्रावधान नहीं था, फिर भी अध्यापाकों ने अतिरिक्त समय देकर इसे चलाने का संकल्प किया। यह पाठ्यक्रम स्व-वित्ती आधार पर प्रारंभ किया गया था और कई वर्षों तक इसी प्रकार स्वत: प्रेरित कार्यक्रम के रूप में चलता रहा। यह पाठ्यक्रम आज तक दिल्ली केंद्र में नियमित रूप से चल रहा है। पिछले 34 वर्षों में इस पाठ्यक्रम में दिल्ली तथा आस-पास के क्षेत्रों के अनेक प्रतिभागी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं और कर रहे हैं।

प्रयोजनमूलक हिंदी के संदर्भ में भारत सरकार के हिंदी अनुवादकों और अधिकरियों उपयोगार्थ वर्ष 1980 से अनुवाद' सिद्घांत और व्यवहार डिप्लोमा का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। पहले वर्ष इस पाठ्यक्रम में 130 आवेदनकर्ता थे और सिर्फ 40 लोगों के प्रवेश मिल सका था पिछले तीस वर्षों से दिल्ली केंद्र में इस कार्यक्रम में अनेक प्रतिभागी प्रशिक्षित हो चुके हैं और अभी भी प्रशिक्षित हो रहे हैं।

इन दोनों पाठ्यक्रमों की यह विशेषता है कि सेवारत प्रतिभागियों के पदोन्नति के अवसर मिले इसीलिए इन पाठ्यक्रमों में दी गयी विविध क्षेत्रों में नौकरी मिली हैं। रोजगारपरक होने के कारण इन पाठ्यक्रमों में प्रवेशार्थियों की माँग बढती गई परंतु केंद्र की अपनी सीमा थी। अत: अधिक व्यक्तियों को प्रवेश नही दिया जा सकता था। अनुवाद डिप्लोमा की सफलता तथा उसमें प्रवेश के लिए आने वाले छात्रों की संख्या को देखते हुए दिल्ली स्थित अनेक संस्थाओं, जैसे- भारती विद्या भवन, मैक्सम्यूलर भवन तथा अनुवाद परिषद् आदि ने संस्थान के पाठ्यक्रम से प्रेरणा लेकर अपने-अपने कार्यक्रम को प्रारंभ कर दिया।

इन सांध्यकालीन डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की सफलता को देखते हुए केंद्र ने 'अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान उच्च डिप्लोमा' का कार्यक्रम प्रारंभ किया, परंतु प्रतिभागियों की पर्याप्त संख्या न होने के कारण इस पाठ्यक्रम को कुछ वर्षों के बाद बंद करना पड़ा।

प्रयोजनमूलक हिंदी का एक और प्रमुख क्षेत्र है 'पत्रकारिता' । दिल्ली केंद्र में 'हिंदी पत्रकारिता' का एक डिप्लोमा पाठ्यक्रम वर्ष 2002 में प्रारंभ किया गया। यह कार्यक्रम बहुत सफल रहा है और अब तक 8 वर्ष में इसमें अनके प्रतिभागी प्रशिक्षित हो चुके हैं। दिल्ली केंद्र में वर्ष 2006 में 'प्रूफ रीडिंग और मुद्रण डिप्लोमा' का पाठ्यक्रम भी प्रारंभ किया गया था, परन्तु किन्ही कारणों से यह कार्यक्रम दो वर्ष ही चला।