शनिवार, अक्टू 19

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वाणी वन्दना

वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव, अमृत-मंत्र नव,

भारत में भर दे!

काट अंध उर के बंधन-स्तर,
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर,
कलुष-भेद-तम हर, प्रकाश भर,

जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद-मंद्र रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को

नव पर, नव स्वर दे!

 

-पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'