बुधवार, अप्रै 24

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लघु पत्रिकाओं पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

"लघु पत्रिकाएँ विकल्पों की संवाहक हैं। लघु पत्रिकाओं को सामाजिक-आर्थिक विषमताओं का वैज्ञानिक ढंग से सामना करना होगा।" यह बात केंद्रीय हिंदी संस्थान, द्वारा आगरा में लघु पत्रिकाओं पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने कही। यह आयोजन संस्थान के नजीर सभागार में संपन्न हुआ। संगोष्ठी में दिल्ली, पंजाब, उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल के पचास से अधिक संपादक-लेखकों ने सहभागिता की। इनमें हिंदी के अलावा पंजाबी लेखक भी शामिल हुए। संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा कि टेलीविजन और बड़े सूचना घरानों के बावजूद लघु पत्रिकाएँ अपनी विशिष्टता के कारण जानी जाती हैं।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक और उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष प्रो.शंभुनाथ ने कहा, लघु पत्रिका लिटिल मीडिया है। यह संस्कृति उद्योगों द्वारा लगातार हाशिए पर ढकेली जा रही कलाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं की जु़बान है।

संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का फोकस 'भाषाई साम्राज्यवाद की चुनौतियाँ और लघु पत्रिकाएँ' विषय पर था। कथाकार रमेश उपाध्याय ने अपना आलेख पढ़ते हुए कहा कि यह साम्राज्यवाद का ही असर है कि चारों तरफ अँग्रेजी राज कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषाई साम्राज्यवाद का विरोध अंग्रेजी का विरोध नहीं है।
साहित्यिक पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विभूतिनारायण राय का कहना था कि भूमंडलीकरण और बाजारवाद से निराश होने और इन पर विलाप करने से कुछ नहीं होगा। विषम स्थितियों में ही श्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है। हेतु भारद्वाज ने कहा कि लघु पत्रिकाएँ बड़े लक्ष्य लेकर काम करती हैं। गोपाल राय ने लघु पत्रिकाओं के लिए एक वेबसाइट की जरूरत बताई। इस सत्र के अध्यक्ष कवि राजेश जोशी का कहना था कि उपभोक्तावाद विचार-शून्यता फैला रहा है। लघु पत्रिकाएँ एक जुट होकर इस चुनौती का जवाब दे सकती हैं। इस सत्र में भारत भारद्वाज, गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, अजेय कुमार, रवि शंकर रवि, योगेन्द्र कुमार, ज्योत्स्ना रघुवंशी, वीना शर्मा ने चर्चा में हिस्सा लिया।

समापन सत्र में अजय तिवारी ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि लघु पत्रिकाएँ वृहद मीडिया के विकल्प के रूप में एक आन्दोलन है। प्रफुल्ल कोलख्यान का कहना था कि लघु पत्रिका आन्दोलन में प्रतिद्वंद्विता की नहीं सहकारिता की जरूरत है। शिवराम ने कहा कि आज विमर्श निष्कर्ष प्रदान नहीं करते। हमारे भीतर एन.जी.ओ.-वाद घुस गया है। सत्रोपरांत प्रश्न-चर्चा में रामकुमार कृषक, जयप्रकाश धूमकेतु, राजेन्द्र शर्मा, इन्दु सिंह, प्रो.रामवीर सिंह, दिवाकर भट्ट, रमेश रावत आदि के अलावा केंद्रीय हिंदी संस्थान के देशी-विदेशी विद्यार्थियों ने उत्साह से भाग लिया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन महेश जायसवाल द्वारा एक जनगीत के गायन और कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।