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अंतरराष्ट्रीय सहयोग

 

केंद्रीय हिंदी संस्थान का अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण फलक  

 


केंद्रीय हिंदी संस्थान राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हिंदी शिक्षण का एक प्रमुख संस्थान है। पिछले लगभग 50 वर्षों से अधिक समय से लगातार संस्थान ने द्वितीय भाषा शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्रविधि में विशेषज्ञता अर्जित की है। विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में भी संस्थान को दुनिया के एक प्रमुख और विश्वसनीय संस्थान के तौर पर प्रतिष्ठा हासिल है।  यही कारण है कि दुनिया के 80 से अधिक देशों से विद्यार्थी संस्थान आकर हिंदी पढ़ चुके हैं और पढ़ना पसंद करते हैं। हर साल लगभग 35 देशों के 200 से अधिक विद्यार्थी संस्थान के आगरा मुख्यालय और दिल्ली केंद्र में आकर हिंदी सीखते हैं। 


हिंदी का अंतरराष्ट्रीय प्रसार 


आज विश्व के लगभग 100 देशों में या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होता है या फिर इन देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। एशिया महाद्वीप में भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यंमार (बर्मा), चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, उजबेकिस्तान, ताजिकस्तान, तुर्की और थाइलैंड देशों में हिंदी अध्ययन-अध्यापन की पुरानी परंपराएँ हैं। इसके अलावा दुनिया भर के तमाम देशों में अलग-अलग तरीक़े से अपने अनेक रूप, अनेक नाम, अनेक कारणों और अनेक प्रयोजनों के साथ अपनी ज़रूरत और मौजूदगी दर्ज कराती है।

आज जिस प्रकार दुनिया भर में अनेक कारणों से हिंदी सीखने-सिखाने की माँग बढ़ी है, उससे इस भाषा को देखने-परखने की दृष्टि में उल्लेखनीय बदलाव आया है। भाषा-शिक्षण के सरोकारों में हिंदी की उभरती पहचान इसका एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण विश्व बिरादरी और विश्व बाज़ार में भारत की उभरती हुई पहचान है।

सन् 1997 से पहले मातृभाषा-भाषियों की संख्या के लिहाज से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिंदी को तीसरा स्थान दिया जाता था लेकिन सन् 1997 के भारत की जनांकिकी (सेंसस ऑफ़ इंडिया) के भाषा-जनांकिकी खंड के प्रकाशन और यूनेस्को की भाषा-प्रश्नावली (सन् 1998) के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब यह तथ्य विश्वस्तर पर स्वीकृत और प्रमाणित है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिंदी का दूसरा स्थान है।

हिंदी अपनी वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेज़ी के साथ आगे बढ़ रही है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हिंदी दुनिया के कई देशों में सूचना, संवाद और व्यापार की एक मजबूत ताक़त के रूप में पहचानी जा रही है। अनेक देशों में इस भाषा को लेकर भाषाई और सांस्कृतिक कारणों से गहरी रूचि है। इस कारण, हिंदी भाषा की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का निरंतर विस्तार हो रहा है। इसको अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक नई पहचान मिल रही है। 

पिछले कुछ सालों में भारत सरकार की अध्येतावृत्ति पर और स्वयं के आर्थिक साधनों से हिंदी सीखने के लिए केद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य उच्च शिक्षण संस्थाओं (जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय का नाम प्रमुख है) में आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। निश्चित रूप से इसके पीछे उनके अपने सुनिश्चित व्यापारिक प्रयोजन और मजबूत आर्थिक-पारिस्थितिकी है लेकिन यह प्रक्रिया हिंदी सीखने के पक्ष में एक प्रमुख प्रयोजन भी है।  


हिंदी शिक्षण के लिए संस्थान के प्राध्यापकों की विदेश-प्रतिनियुक्तियाँ 


अंतरराष्ट्रीय फलक पर हिंदी को निरंतर समृद्ध बनाने की दिशा में देश-विदेश के अनेक विद्वान हिंदी शिक्षकों, भाषाविदों ने निरंतर कार्य किया है और आज भी कर रहे हैं। इन सबके प्रयासों से ही हिंदी के शैक्षणिक विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। पिछले लगभग 40 वर्षों में विदेशों में प्रतिनियुक्ति के जरिए हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ देने वाले  संस्थान के प्राध्यापकों का विवरण निम्नवत है-

 

क्र. सं.

प्राध्यापक का नाम

देश/विद्यालय

अवधि

1.

डॉ. (कु.) पुष्पा श्रीवास्तव

फ्लोरेडा स्टेट विश्वविद्यालय

1.8.75 से 18.12.1977 तक

2.

डॉ. मदन लाल वर्मा

काबुल

15.4.1976 से 12.1.1977 तक

3.

डॉ. धर्मपाल गांधी

यार्क विश्वविद्यालय

19.9.1978 से 20.10.1980 तक

4.

डॉ. एस. के रोहरा

गयाना

27.9.1978 से 26.9.1982 तक

5.

डॉ. संयुक्ता कौशल

पश्चिम जर्मनी

16.1.1979 से 6.5.1983 तक

6.

डॉ. ठाकुर दास

क्यूबा

26.7.1979 से 27.2.1983 तक

7.

डॉ. शंभुनाथ पांडेय

मॉरीशस

17.8.1979 से 19.10.1981 तक

8.

डॉ. उमाशंकर शर्मा सतीश

सूरीनाम

1.12.1981 से 29.11.1983 तक

9.

डॉ. शेरबहादुर झा

गयाना

1.1.1982 से 11.6.1985 तक

10.

डॉ. श्रीशचंद्र जैसवाल

यार्क विश्वविद्यालय

9.10.1983 से 15.7.1984 तक

11.

डॉ. रविप्रकाश श्रीवास्तव

यार्क विश्वविद्यालय

16.1.1985 से 14.4.1985 तक

12.

डॉ. (श्रीमती) चंद्रप्रभा

यू.एस.ए

8.7.1985 से 4.7.1988 तक

13.

डॉ. रविप्रकाश गुप्त

पोलैंड

15.9.1987 से 14.9.1989 तक

14.

डॉ. श्रीमती मंजू गुप्ता

पोलैंड

15.9.1987 से 13.9.1990 तक

15.

डॉ. ललित मोहन बहुगुणा

यार्क विश्विद्यालय

20.10.1987 से 25.9.1988 तक

16.

डॉ. अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

इटली

18.12.1987 से 1.11.1992 तक

17.

डॉ. सूरजभान सिंह

रोमानिया

1.1.1988 से 10.1.1993 तक

18.

डॉ. धर्मपाल गांधी

कोरिया

5.4.1988 से 15.2.1990 तक

19.

डॉ. श्रीशंचन्द्र जैसवाल

मास्को

1.8.1989 से 16.9.1992 तक

20.

डॉ. मोहन लाल सर

हैलसिंकी (फिनलैंड)

18.9.1990 से 31.7.1993 तक

21.

डॉ. चतुर्भुज सहाय

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन

20.8.1991 से 21.6.1992 तक

22.

डॉ. एम. जी चतुर्वेदी

ट्रिनीडाड

20.10.1991 से 23.10.1992 तक

23.

डॉ. गीता शर्मा

मॉस्को

30.7.1994 से 17.12.1997 तक

24.

डॉ. देवेन्द्र शुक्ल

बुल्गारिया (सोफिया)

27.9.1994 से 28.10.1996 तक

25.

डॉ.(श्रीमती) अनीता गांगुली

हैलसिंकी (फिनलैंड)

24.9.1994 से 31.7.1997 तक

26.

डॉ. धर्मपाल गांधी

जापान

1.5.1996 से 5.5.1998 तक

27.

डॉ. एम. ज्ञानम

कोरिया

6.9.1997 से 31.8.1999 तक

28.

डॉ. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव

जापान

4.4.1998 से 3.4.2000 तक

29.

डॉ. (श्रीती) सी. ई. जीनी

चीन

4.9.1998 से 4.10.2000 तक

30.

डॉ. अरुण चतुर्वेदी

जापान

23.3.2000 से 31.3.2002 तक

31.

डॉ. रवि प्रकाश गुप्त

हंगरी

6.10.2000 से 5.10.2003 तक

32.

डॉ. के.जी. कपूर

अफगानिस्तान

24.10.2007 से 31.10.2009 तक

33.

डॉ. सुशीला थॉमस

अंकारा वि.वि. टर्की

10.11.2008 से 30.9.2011 तक

34.

डॉ. प्रमोद शर्मा

एल्ते वि.वि. बुडापोस्ट (हंगरी)

17.7.2008 से 20.1.2011 तक

35.

डॉ. देवेन्द्र शुक्ल

पैकिंग वि.वि. बीजिंग (चीन)

6.2.2009 से फरवरी (दो वर्ष के लिए)

36.

डॉ. गीता शर्मा (दो बार)

ओसाका वि.वि. जापान

1.10.2002 से 31.3.2005 तक

37.

 प्रो. श्रीचंद्र जैसवाल

बल्लाडोलिड वि.वि. स्पेन

6.10.2010 से दो बर्ष तक

 


विदेशी शिक्षण संस्थानों के साथ शैक्षणिक सहयोग एवं समन्वय


विदेशी भाषा हिंदी शिक्षण, विदेशों में हिंदी शिक्षण और  विशेषतः बहुसांस्कृतिक परिवेश में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में संस्थान की विशेषज्ञता और अनुभव को देखते हुए संस्थान को दुनिया भर के देशों का विश्वास हासिल हुआ है।  


हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के साथ संभव हुए वैश्विक संवाद के जरिए इस भाषा को नई चेतना, नई ऊर्जा और आधुनिकताबोध हासिल हुआ है। ज्ञान-विज्ञान की नई अवधारणाओं के साथ इसमें अनेक नए शब्दों की सर्जना हुई है, हो रही है। लेकिन इस दिशा में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। 

हिंदी की व्यापक स्वीकृति और विकास के लिए इसमें समावेशिकता और सरलता के मुद्दों पर दूरदृष्टि और संवेदनशीलता से काम करने की ज़रूरत है। निस्संदेह हिंदी के अंतरराष्ट्रीय शिक्षण-अनुसंधान मार्ग में अनेक चुनौतियाँ हैं । फिर भी हिंदी संभावनाओं का एक ऐसा द्वार है जो विकास और सर्जनात्मकता के लिए सदैव खुला रहता है।