बुधवार, सित 19

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अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी - भक्ति साहित्य एवं संत कबीर

दिनांक 27 एवं 28 जनवरी, 2018


प्रथम दिवस (दिनांक 27 फरवरी, 2018) उद्घाटन समारोह एवं प्रथन-द्वितीय शैक्षिक सत्र , स्थान - अटल बिहारी वाजपेयी अंतरराष्ट्रीय सभागार, कें.हिं.सं., आगरा


केंद्रीय हिंदी संस्थान, द्वारा दिनांक 27 एवं 28 जनवरी, 2018 को "भक्ति साहित्य एवं संत कबीर" विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन दिनांक 27 जनवरी, 2018 को प्रातः 11.00 बजे हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. जय प्रकाश, पूर्व विभागाध्यक्ष, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. श्रीधर पराडकर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संगठन मंत्री एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. उमेश सिंह, निदेशक, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी उपस्थित थे। साथ ही केंद्रीय हिंदी संस्थान, के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय मंच पर उपस्थित थे।


 

उद्घाटन सत्र का आरंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान के विदेशी छात्रों द्वारा सरस्वती वंदना एवं संस्थान गीत प्रस्तुत किया गया। अतिथियों का स्वागत फूलमाला एवं शॉल ओढ़ाकर संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने किया। प्रो. हरिशंकर, शैक्षिक समन्वयक, केंद्रीय हिंदी संस्थान ने स्वागत भाषण दिया।


 

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के आरंभ में केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को स्वर्णकाल का नाम दिया गया है। भक्ति आंदोलन पहला आंदोलन है जिसे सर्व स्वीकार्यता एवं सर्वग्राह्यता प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति साहित्य पर काफी परिश्रम किया। भक्तिकाल में गुरु अर्जुन देव ने संतों की वाणियों को संग्रहीत कर बड़ा काम किया। अब तक सैकड़ों विद्वानों ने कबीर की वाणियों को संग्रहीत किया है।


 

देश के अलग-अलग हिस्सों के संतों और आचार्यों ने भक्ति साहित्य को प्रभावित किया। लेकिन सबसे अधिक प्रभावित किया रामानन्द ने। रामानन्द कबीर के गुरु के रूप में जाने जाते हैं। भक्ति आंदोलन में सभी जातियों के संत सम्मिलित थे जिन्होंने भक्ति साहित्य को समृद्ध किया। संतों और भक्तिकाल के आचार्य यद्यपि संस्कृत में लिख सकते थे लेकिन उन्होंने देशी भाषा को अपनाया और जो संस्कृत में नहीं लिख सकते थे उन्हें भी इस बात का कोई मलाल नहीं रहा।

 

उन्होंने कहा कि संतों में नामदेव एक सर्वस्वीकार्य संत हैं। मराठी वाले नामदेव को अपना मानते हैं। हिंदी साहित्य में भी नामदेव को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। गुरुग्रंथ साहब में सबसे अधिक वाणी नामदेव की है। संत साहित्य का केंद्र कबीर हैं लेकिन साहित्य को प्रामाणिक बनाने की सबसे अधिक चिंता दादू दयाल ने की। संपूर्ण भारत में भक्ति साहित्य लिखा गया लेकिन अभी तक उसे हिंदी साहित्य के अंतर्गत नहीं लाया जा सका है। बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, गुजरात के नरसिंह मेहता तथा श्रीलंका के तमिल विद्वानों ने भी भक्ति की रचनाएँ लिखी हैं। पूर्वोत्तर में शंकरदेव और माधवदेव ने कृष्ण भक्तिपरक रचनाएँ लिखी हैं। उन्होंने ब्रजबुलि में भक्ति साहित्य की रचना की है। शंकरदेव ने वृन्दावन की यात्रा की तथा रामसेतु देखने गये थे। उन्होंने कहा कि निर्गुण-सगुण का जो भेद उत्तर भारत में है, वह महाराष्ट्र में नहीं है। रीतिकाल के भीतर भी बहुत सारे कवि भक्ति की कविताएँ लिख रहे थे जैसे रज्जब आदि।

 


 

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि डॉ. उमेश सिंह ने कहा कि आजकल हजारों एनजीओ भारत की ज्ञान परंपरा को शून्य करना चाहते हैं, उसे विक्षिप्त करना चाहते हैं। इस देश में कभी अवर्ण और सवर्ण नहीं रहा। यह 19वीं सदी का शब्द है। 19वीं सदी में ही दलित, हरिजन आदि शब्द आते हैं। यह समाज को तोड़ने की साजिश है। जो पुस्तक समाज को दृष्टि ना दे ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन का अर्थ नहीं है।


 

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डॉ. श्रीधर पराडकर जी ने कहा कि अपनी मान्यताओं को अलग रखकर संत साहित्य का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि जिस भावभूमि पर संतों ने साहित्य की रचना की है वह हमारी समझ से परे है। भक्ति की बात करते हुए हमें अध्यात्म को समझना होगा। अध्यात्म से ज्ञान का वर्धन होता है। स्त्री-पुरुष का भेद यदि ब्रह्म का ज्ञान होने पर बना हुआ है तो वह ज्ञान बेकार है। जिस समाज में सर्वाधिक जागृति होती है उस समाज में सबसे अधिक साहित्य मिलता है।


 

संगोष्ठी का अध्यक्षीय संबोधन देते हुए प्रो. जयप्रकाश ने कहा कि भक्ति की धारणा एकाकी जीवन की धारणाएँ नहीं है; यह एक युग का चिंतन नहीं है। यह वैदिक युग से चले आ रहे चिंतन का सार है। वैदिक साहित्य से भक्ति साहित्य, यह एक अनवरत चलने वाली परंपरा है। एक स्वतंत्र साहित्य है और दूसरा साहित्य वह है जिसमें अनुभव है। जिस परिवेश में कबीर आये उस समय धर्मान्तरण प्रबल था। हिंदुत्व में अर्धनारीश्वर होने के कारण पुरुष स्त्री को नहीं छोड़ता। इसलिए वह हिंदुत्व को श्रेष्ठ मानते हैं। भक्ति साहित्य में बहुत कुछ उपेक्षित है उसका अध्ययन होना चाहिए। हमारा भक्ति साहित्य आज के राजनीतिक वातावरण में लड़ने की शक्ति दे सकता है। इस पर विचार करना चाहिए।


 

संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. निरंजन सिंह ने की। इस सत्र में डॉ. पूनम कुमारी ने भक्ति के पुनर्मूल्यांकन के आयाम विषय पर बोलते हुए कहा कि कई संस्थानों और पुस्तकालयों में भक्तिकालीन संतों के बहुत सारे ग्रंथ रखे हुए हैं। इन ग्रंथों में जो पद हैं उनके अनुसार इनमें ये भेद करना मुश्किल है कि ये पद निर्गुण भक्ति के हैं या सगुण भक्ति के। डॉ. बलजीत श्रीवास्तव ने भक्ति आंदोलन में मुस्लिम संतों की परंपरा विषय पर बोलते हुए कहा कि बाहर से आयी हुई सूफी परंपरा भारतीय परंपराओं में घुलमिल गई। सूफी संप्रदायों का उदय भारत से बाहर हुआ लेकिन भारत में भी इनका महत्व कम नहीं रहा। डॉ. विवेकानन्द उपाध्याय ने कबीर का काव्य और हिंदी आलोचना विषय पर बोलते हुए कहा कि हिंदी आलोचना में सगुण-निर्गुण के विचार को आरंभ में द्वंद्व के रूप में शुरू हुआ, बाद में इसे संघर्ष का रूप दे दिया गया। डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि भक्ति साहित्य पर बात करने से पहले प्राच्य और वाम विचारों को ध्वस्त करना होगा। इनके दायरें में भक्ति साहित्य पर बात नहीं हो सकती। भक्ति में सगुण-निर्गुण की खाई ईसाइयत के प्रभाव से अधिक बढ़ गई।


 

इसके साथ ही डॉ. नीलाभ कुमार, डॉ. सत्य प्रकाश पाल, डॉ. राकेश पाण्डेय, डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी, डॉ. रमाकांत राय, डॉ. ज्योतिश्वर मिश्र, डॉ. नरेंद्र मिश्र, डॉ. मधुरिमा शर्मा, अन्नाराम शर्मा ने भी भक्ति साहित्य के संबंध में अपने-अपने विचार व्यक्त किये।


 

संगोष्ठी की द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ. चंदन कुमार चौबे ने की। इस सत्र में डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी, डॉ. राजीव रंजन, डॉ. संजय कुमार गुप्ता, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. मुन्ना पाण्डेय, श्री मार्तण्ड सिंह, डॉ. तस्मिना हुसैन, डॉ. नीलम मिश्र ने आलेख वाचन किया।


 

संगोष्ठी में संस्थान के शैक्षिक सदस्य, छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. सपना गुप्ता (संगोष्ठी संयोजक), तथा प्रथम सत्र का संचालन डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी और द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. उमापति दीक्षित ने किया।


 

सांस्कृतिक कार्यक्रम

संगोष्ठी के तृतीय सत्र के उपरांत संस्थान के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। श्रीलंका के विद्यार्थियों द्वारा सिंघली नृत्य प्रस्तुत किया गया। अरुणाचल एवं नागालैंड के विद्यार्थियों ने बिहु नृत्य प्रस्तुत किया। त्रिनिडाड एवं श्रीलंका के छात्रों ने भजन प्रस्तुत किये। देशी एवं विदेशी विद्यार्थियों द्वारा संभलपुरी नृत्य, पंजाबी नृत्य एवं झूमर नृत्य प्रस्तुत किये।


 संगोष्ठी का द्वितीय दिवस (दिनांक 28 जनवरी, 2018) तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम शैक्षिक सत्र एवं समापन समारोह, स्थानः सूरकुटी रुनकता, आगरा


केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस का आयोजन सूरकुटी रुनकता में किया गया। दिनांक 28.01.2018 के दिन संगोष्ठी का आरंभ महाकवि सूरदास नेत्रहीन विद्यालय के छात्र रोहित एवं उसके साथियों द्वारा महात्मा सूरदास के भजन "मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै" की भावपूर्ण प्रस्तुति से हुआ। 


दूसरे दिन आयोजित संगोष्ठी के तीसरे और चौथे सत्रों की अध्यक्षता प्रो. अनिल कुमार राय ने की तथा समापन सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने की। अध्यक्षीय संबोधन देते हुए प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने कहा कि श्रमजीवी साधुता भक्तिकाल की सबसे बड़ी विशेषता है। शरीर की पवित्रता के लिए श्रम जरूरी है। अभी भक्तिकाव्य की बहुत बड़ी ग्रंथराशि अप्रकाशित है। कविता के साथ लोक जुड़े इसकी चिंता भक्तकाव्य ने की। हिंदी की समीक्षकों ने कर्मकाण्ड का विरोध और समाज सुधार एक बात नहीं है। समीक्षकों ने बाह्य चीजों पर अधिक लिखा है और आंतरिक चीजों पर कम। उन्होंने कहा कि कविता की रक्षा के दो उपक्रम हुए एक वैदिककाल में दूसरा चरण भक्तिकाल में हुआ। भक्तिकाल की कविता विविध गायन-वादन की पद्धतियों में रची गई। भक्त कवियों ने आसपास की शब्दावलियों को कविता की भाषा में लिय़ा ताकि वह लोक तक पहुँच सकें।


मुख्य अतिथि प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय, मुंबई ने कहा कि भक्तिकाल को लेकर आचार्य शुक्ल की कोई मान्यता आजतक खारिच नहीं हुई। भक्त कवियों में आपस में कोई बैर नहीं है। वह आलोचकों का पैदा किया हुआ है। भक्तिकाल को समग्रता में देखने की आवश्यकता है। यह एक सुखद संयोग है कि जिस समय भारत में भक्ति आंदोलन होता है उसी समय इटली में पुनर्जागरण होता है जो यूरोप को अलग दिशा में ले जाता है। यूरोप भौतिक प्रगति की ओर अग्रसर होता है और भारत आध्यात्मिक प्रगति की ओर। कबीर के काव्य के प्रक्षिप्त अंश का ठीक ढंग से पुनः अध्ययन होना चाहिए। समुचा भक्तिकाव्य मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा का काव्य है।



विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे उत्तर भाषा संस्थान लखनऊ के अध्यक्ष डॉ. राजनारायण शुक्ल ने कहा कि भक्तिकाल में एक साथ इतने संतों का आगमन आश्चर्य की बात है। जब-जब भारत पर संकट आया है तब-तब तक पुण्यात्माएँ प्रकट होती हैं। जो कार्य उन संत कवियों ने उस समय किया वह राष्ट्रीय आंदोलन में किये गए प्रयासों से किसी भी श्रेणी में कम नहीं है। क.मुं.हिंदी विद्यापीठ के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने कहा कि भक्तिकाल की अवधारणाओं की प्रासंगिकता आज भी है। कबीर समरसता के और सद्भाव के कवि थे। लखनऊ विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि भक्ति आंदोलन पूरे राष्ट्र में व्यापक रूप से फैला था। इसमें आदान-प्रदान की प्रक्रिया दीखती है। यह शुद्ध धार्मिक आंदोलन नहीं है। भक्ति आंदोलन के केंद्र मनुष्य हैं।

द्वितीय दिवस आयोजित शैक्षिक सत्रों के वक्ताओं के अनुक्रम में सर्वप्रथम आए डॉ. अमरेंद्र त्रिपाठी ने उत्तर भारत की भक्ति परंपरा और महापुरुष शंकरदेव विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। डॉ. दर्शन पाण्डेय ने भक्तिकाल के कवियों में सामाजिक समरसता का स्वर विषय पर, श्री चंद्रकांत कोठे ने संत ज्ञानेश्वर का मूल्यांकन, डॉ. मनीष ने दलित-विमर्श के दौर में कबीर की प्रासंगिकता, श्री आदित्य कुमार मिश्र ने भक्ति आंदोलन एवं पूर्वोत्तर भारत, डॉ. अमन कुमार ने भक्ति आंदोलन और राष्ट्रीय एकता में भक्त कवियों की भूमिका, डॉ. महेंद्र सिंह ने भक्ति आंदोलन में मराठी संतों की भूमिका, डॉ. मीरा सरीन ने वैश्विक संदर्भ में कबीर और विदेशी छात्र विषय पर, डॉ. रमेश यादव ने भक्ति आंदोलन में मराठी एवं गुजराती संतों की भूमिका, श्री गजेंद्र कुमार ने सूफी कविता पर अद्वैतवाद का प्रभाव, डॉ. नम्रता निश्चल त्रिपाठी ने भक्ति साहित्य में सूफी प्रेम दर्शन विषय पर विचार व्यक्त किए। इनके अतिरिक्त डॉ. संजीव दुबे, डॉ. अन्नाराम शर्मा, डॉ. अनिल कुमार राय आदि ने अपने विचार व्यक्त किए।

द्वितीय दिवस के कार्यक्रम में संस्थान के अध्यापक एवं छात्र उपस्थित थे। संचालन श्री अनुपम श्रीवास्तव एवं डॉ. जोगेंद्र सिंह मीणा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की कुलसचिव प्रो. बीना शर्मा ने किया। संगोष्ठी का संयोजन डॉ. सपना गुप्ता ने किया।