गुरुवार, अक्टू 17

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बल्ली सिंह चीमा

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बल्ली सिंह चीमा उत्तराखंड राज्य के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी लिखी कविताएँ अन्धेरे में मशाल की भाँति कार्य करती हैं। बल्ली सिंह की कविताएँ पुस्तकालय की शोभा नहीं बनती, अपितु अन्याय और जुल्म के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आती हुई प्रतीत होती हैं। जीवन संघर्षों और जन आंदोलनों में बल्ली सिंह चीमा ने अपनी ज़िन्दगी का अधिकांश समय व्यतीत किया है।

परिचय

बल्ली सिंह चीमा का जन्म 2 सितम्बर, 1952 में चीमाखुर्द गाँव, अमृतसर ज़िला, पंजाब में हुआ था। इनकी माता का नाम सेवा कौर था। इन्होंने स्नातक के समकक्ष प्रभाकर की डिग्री 'गुरु नानक विश्वविद्यालय', अमृतसर से प्राप्त की थी। चाहे उत्तराखंड आंदोलन रहा हो या फिर राज्य बनने से पूर्व शराब विरोधी आंदोलन, सभी में बल्ली सिंह अपनी कविताओं के साथ जनता के मध्य उपस्थित रहे। बल्ली सिंह चीमा अपनी जमीन से जुड़े हुए जनकवि हैं। कृषि एवं फ़्रीलांस पत्रकारिता दोनों को ही इन्होंने समान रूप से अपनाया है।

कविता तथा जनगीत

देश भर के कविता मंचों और विश्वविद्यालयों में कविता पाठ करने के साथ-साथ बल्ली सिंह चीमा देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी अपनी रचनाओं सहित उपस्थित रहते हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा, बाबा आम्टे और मेधा पाटेकर जैसे सक्रिय समाज सेवियों ने बल्ली सिंह की कविताओं और जन गीतों को अपनाया है। इन गीतों की गतिशीलता और त्वरा से इन लोगों ने अपने आंदोलन को एक नई धार दी है।

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कविता संग्रह

ख़ामोशी के ख़िलाफ़
जमीन से उठती आवाज़
तय करो किस ओर हो तुम
ग़ज़लें तथा गीत
हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका
मैं अमरीका का पिठ्ठू और तू अमरीकी लाला है
ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के
बर्फ़ से ढक गया है पहाड़ी नगर
कूलरों को क्या पता कि बहती हवा क्या चीज़ है
ऐसा भी हो सकता है

पुरस्कार तथा सम्मान

चीमा जी को 'देवभूमि रतन सम्मान' (2004), 'कुमाऊँ गौरव सम्मान' (2005), 'पर्वतीय शिरोमणि सम्मान' (2006), 'कविता कोश सम्मान' (2011) से सम्मानित किया गया है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जटिल चुनौती को पूरी रचनात्मक सक्रियता से स्वीकार करने वाले बल्ली सिंह चीमा को 'गंगाशरण सिंह पुरस्कार' से सम्मानित करके 'केंद्रीय हिंदी संस्थान' ने भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया है।