मंगलवार, जुल 25

  •  
  •  

राष्ट्रीय संगोष्ठी - भाषा-प्रौद्योगिकी और ई-शिक्षण

सूचना तथा भाषा-प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "भाषा-प्रौद्योगिकी और ई-शिक्षण (द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में हिंदी का संदर्भ)" का प्रतिवेदन 

पहला दिन (20.04.2017)
उद्घाटन सत्र :
भाषा प्रौद्योगिकी एवं ई-शिक्षण (द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में हिंदी का संदर्भ) विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य उद्घाटन आज 20-04-2017 को केंद्रीय हिंदी संस्थान के अभिनव मल्टीमीडिया कक्ष, सूचना एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग में किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा के उपाध्यक्ष प्रो. कमल किशोर गोयनका ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
स्वागत वक्तव्य केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नन्दकिशोर पाण्डेय ने दिया।
अपने वक्तव्य में प्रो. जगन्नाथन का परिचय देते हुए निदेशक महोदय ने कहा कि संस्थान की प्रतिष्ठा आज जगन्नाथन जैसे आचार्यों के कारण बनी है। आज अनेक विश्वविद्यालयों में साहित्यिक हिंदी के स्थान पर व्यावहारिक हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है, इसका श्रेय प्रो. जगन्नाथन जी को है। निदेशक महोदय ने बताया कि उनके द्वारा भाषा प्रौद्योगिकी विभाग में भाषा प्रयोगशाला के लिए नवीनतम सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर उपलब्ध कराए गए हैं, जिस पर छात्र उच्चारण एवं वर्तनी का अभ्यास कर अपनी हिंदी को सुदृढ़ कर सकेंगे।
प्रो. कमल किशोर गोयनका ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि इंटरनेट ने आज हमारे सामने ज्ञान का विस्फोट कर दिया है, किंतु इसके साथ-साथ अज्ञान का विस्फोट भी हुआ है। इस तकनीक ने हमारे उत्थान के साथ-साथ हमारे पतन का मार्ग भी खोल दिया है। विज्ञान के सत्य के साथ अगर हम नहीं चलेंगे, तो निश्चित पराजित होंगे।
प्रो. जगन्नाथन ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अंकीय सूचनाओं का संसाधन करती है। भाषा के अंकीय संसाधन से हम भाषा संबंधी उपयोगी कार्यक्रमों का निर्माण कर सकते हैं। ई-शिक्षण का प्रयोग भाषा-शिक्षण को व्यापक बनाने में बहुत महत्वपूर्ण है। इस कार्य के लिए हमें विधि की सैद्धांतिक बातों की अपेक्षा विधि की उपयोगिता को महत्व देना चाहिए। भाषा प्रशिक्षण के बदलते परिवेश के संदर्भ में उन्होंने दूरस्थ शिक्षा के लोकतांत्रीकरण की चर्चा की उन्होंने कहा ऐसे प्रयास किए जाएँ कि स्वशिक्षण को बल मिल सके। यदि हम एक कक्षा में शिक्षण कर रहे तो हमारी पहुँच सिर्फ कक्षा तक सीमित न होकर सभी तक हो सके। यह आवश्यक है कि सभी विषयों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सामग्री हमारे पास है। इसके लिए साझा प्रयास किए जाने चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने पूरे भारत के लिए एक मानक पाठ्यक्रम की बात की। उन्होंने कहा कि हम ऐसे पाठ्यक्रम की कल्पना करें, जिसे हर स्थान के लोगों की जरूरतों के हिसाब से बनाया जाए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जे.एन.यू. के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष प्रो. जी.एन. झा ने अपने वक्तव्य में कहा कि ई-शिक्षण के पर्याप्त अवसर भारत में उपस्थित हैं। आज हम रियल टाइम मशीन सिस्टम के माध्यम से किसी व्याख्यान को पूरे देश की किसी भी भाषा में सुन सकते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा बहुभाषिक होनी चाहिए। इसका डिग्री एवं लिपि से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। उन्होंने ई-लर्निंग और ई-कंटेंट में अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम का काम कंटेंट की मॉनिटरिंग करना है, इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का समन्वय भी होता है। हमें देश के हिसाब से ई-लर्निंग कंटेंट विकसित करना होगा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में क.मुं. हिंदी विद्यापीठ के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने अपने वक्तव्य में संस्थान की गतिवधियों के प्रयासों की जानकारी दी और वर्तमान में ई-शिक्षण में प्रयोग की जा रही तकनीक की उपयोगिता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आधुनिक कंप्यूटर पद्धति का प्रयोग कर साहित्य के अध्ययन को कैसे उपयोगी बनाया जा सकता है। उन्होंने विद्यापीठ में ‘शब्द’ नामक कोश के निर्माण के प्रयास की जानकारी दी, जिसके माध्यम से किसी साहित्यकार का नाम डालते ही उससे संबंधित संपूर्ण जानकारी मिल सकेगी।
अंत में संगोष्ठी के संयोजक प्रो. देवेंद्र शुक्ल ने सभी आमंत्रित विद्वानों एवं आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
सत्र का संचालन डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी ने किया।
प्रथम और द्वितीय संयुक्त सत्र :
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व प्रो. अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने की। सत्र में निम्न विद्वानों ने आलेख वाचन किया। कानपुर विश्वविद्यालय से पधारे डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने भाषा प्रौद्योगिकी, ‘ई-शिक्षा : सीमाएँ एवं संभावनाएँ’ विषय पर, डॉ. सुभाष चंद्र, जे.एन.यू ने ‘वेब आधारित ई-शिक्षण उपकरणों के माध्यम से भाषा शिक्षण में संगणकीय भाषाविज्ञान की भूमिका’ पर, डॉ. नरेंद्र मिश्र, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर ने ‘भाषा प्रौद्यगिकी एवं ई-शिक्षण’ पर, डॉ. नवीन नंदवाना, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, जोधपुर ने ‘प्रौद्योगिकी व हिंदी भाषा शिक्षण’ पर, डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह, दिल्ली विश्वविद्याल ने ‘सूचना-आधारित समाज के निर्माण में प्रौद्योगिकी की भूमिका’ पर, डॉ. पुनीत बिसारिया, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने ‘हिंदी शिक्षण में ई-माध्यमों की भूमिका’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किए।
सत्र का संचालन प्रो. देवेंद्र शुक्ल ने किया।

दूसरा दिन (21.04.2017)
तृतीय एवं चतुर्थ संसुक्त सत्र :
संगोष्ठी के तीसरे एवं चौथे संयुक्त अकादमिक सत्र के दौरान वाराणसी से आईं डॉ. वंदना झा ने कहा कि हिंदी साहित्य को पढ़ाने के लिए टूल्स का विकास किया जाना चाहिए। कविता तथा उसकी लिप्यंतरण या अनुवाद से विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण या द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण का कार्य पूरा नहीं हो पाता। मुहावरे, पर्यायवाची, आदर-सूचक शब्दों की समझ, बिंबों का ज्ञान, रूपकों का ज्ञान कुल मिलाकर भाषा की संवेदनात्मक विरासत को समझाने के लिए ई-शिक्षण की दिशा में पहल करनी होगी।
के.एम.आई. के भाषाविज्ञान विभाग से पधारे डॉ. रीतेश कुमार और केंद्रीय हिंदी संस्थान की कॉर्पोरा परियोजना के प्रभारी श्री केशरीनंदन ने अपने संयुक्त शोध-पत्र में ऑटोमैटिक स्कोरिंग को निबंध के स्तर पर जांचने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, द्वारा तैयार किए जा रहे हिंदी वर्तनी परीक्षक टूल का प्रदर्शन भी किया।
अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पधारे डॉ. पल्लव विष्णु ने बताया कि सूचना भाषा प्रौद्योगिकी एवं भाषा-शिक्षण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन्होंने कहा कि भाषाओ को बचाने के लिए लिपि को पहले संरक्षित करना आवश्यक है। उन्होंने अपने आलेख में ई-अधिगम के घटक प्रविधियों, प्लेटफॉर्म टूल्स आदि की महत्वपूर्ण चर्चा की।
शांतिनिकेतन से आए डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी ने मानव मशीन इंटरफेस पर पावर पॉइंट के माध्यम से प्रस्तुतिकरण किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न संस्थाओं में चल रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी साझा करनी चाहिए, इससे धन व समय की बर्बादी रुकेगी।
इस दौरान अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. विनीता सिंह (प्रोफेसर, समाज विज्ञान संस्थान) ने प्रस्तुत किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने सभी आलेख प्रस्तुतकर्ताओं के विचारों का समाहार किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने अपने विषय क्षेत्र स्टाइलोमैट्री का परिचय प्रस्तुत किया। इस सत्र का संचालन डॉ. सपना गुप्ता ने किया।
पंचम सत्र :
पाँचवें सत्र में लखनऊ विश्वविद्याल से पधारी डॉ. श्रुति ने ‘भाषा-शिक्षण में न्यू मीडिया की भूमिका’, डॉ. दर्शन पांडेय ने ‘वैकल्पिक न्यू मीडिया का शैक्षिक उपयोग’, डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी ने ‘हिंदी कॉर्पोरा : प्रयास और उपलब्धियाँ’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किया। डॉ. अनुपम श्रीवास्तव ने ‘ई-शिक्षण, संप्रेषण और मल्टीमीडिया प्रस्तुतियों का सुरुचि-सौंदर्यशास्त्र’, डॉ. चंद्रकांत कोठे ने ‘द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी के संदर्भ में ई-शिक्षण एवं अधिगम’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किया।
इस सत्र की अध्यक्षता अहमदाबाद से पधारे डॉ. संजीव दुबे ने की। अपने उद्बोधन में उन्होंने सभी आलेख वाचकों के विचारों का समाहार करते हुए अपने विचार भी प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि तकनीक मनुष्य की सहयोगी है, कोई भी मनुष्य के स्थानापन्न के रूप में तकनीक को स्थापित नहीं कर सकता। तकनीक कभी भी शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकती। सत्र का संचालन केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. चंद्रकांत कोठे ने किया।
समापन सत्र :
भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास का रास्ता प्रौद्योगिकी से होकर निकलेगा। इसके लिए केंद्रीय स्तर पर एक भाषायी आयोग के गठन की बेहद जरूरत है’, यह बात विख्यात भाषाविद और इग्नू के पूर्व निदेशक प्रो. वी.आर. जगन्नाथन ने कही। वे केंद्रीय हिंदी संस्थान के भाषा प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में अध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय और विशिष्ट अतिथि प्रो. अश्विनी कुमार श्रीवास्तव।
समापन सत्र का समाहार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. देवेंद्र शुक्ल ने प्रौद्योगिकी के दार्शनिक और बहुविषयी पक्षों को जोड़ते हुए कहा कि संगोष्ठी में प्रस्तुत विभिन्न आलेखों में दिए गए प्रस्तावों और सुझावों पर विभाग गंभीरतापूर्वक कार्य करेगा और हिंदी में ई-शिक्षण सामग्री विकास के लिए निकट समय में कार्यशालाओं की श्रृंखला आयोजित करेगा। प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने हिंदी के प्रौद्योगिकी विकास के लिए चौदह सूत्रीय रोड-मैप प्रस्तुत किया।
इस दौरान बाह्य विद्वानों-अतिथियों के साथ संस्थान से प्रो. हरिशंकर, डॉ. राजशंकर शर्मा, श्री दिवाकर नाथ त्रिपाठी, श्री अनिल पांडेय, डॉ. आकाश भदौरिया आदि उपस्थित रहे।
अंत में संगोष्ठी में पधारे सभी विद्वज्जन एवं अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन श्री केशरी नंदन ने तथा संचालन श्री अनुपम श्रीवास्तव ने किया।
दो दिन चली इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयोम एवं महाविद्यालयों से आमंत्रित विद्वज्जन के अतिरिक्त आगरा और आस-पास के क्षेत्रों के शिक्षण संस्थानों से आए प्राध्यापक एवं शोधार्थी उपस्थिति हुए।