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केंद्रीय हिंदी संस्थान की विकास यात्रा

संस्थान की स्थापना सन् 1960 में हुई थी। तब से आज तक लगातार मंडल द्वारा निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के अनुपालन में संस्थान हिंदी के शैक्षणिक विकास, बहुआयामी अनुसंधान और प्रचार-प्रसार के लिए अपनी गतिविधियों को विस्तार देता रहा है। पाँच दशकों से अधिक लंबी इस विकास-यात्रा के उल्लेखनीय पड़ावों की जानकारी इस खंड में बिंदुवार प्रस्तुत की जा रही है।

 

15 मार्च, सन् 1951

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के मार्गदर्शन में लालकिले में आयोजित अखिल भारतीय संस्कृति सम्मेलन में सर्वसम्मति से हिंदी को प्रशासनिक माध्यम और सामाजिक संस्कृति की संवाहिका के रूप में विकसित करने के लिए एक अखिल भारतीय स्तर की संस्था को स्थापित करने का निश्चय।

सन् 1952

अखिल भारतीय हिंदी  परिषद् की आगरा की स्थापना।

परिषद् द्वारा अखिल भारतीय हिंदी महाविद्यालय की स्थापना।

पं. देवदूत विद्यार्थी महाविद्यालय के संचालक और डॉ. सत्येन्द्र प्राचार्य नियुक्त।

हिंदीतर भाषा, भाषी राज्यों के हिंदी प्रचारकों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम प्रारम्भ। 

सन् 1953

अखिल भारतीय हिंदी परिषद् को शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार से आंशिक अनुदान स्वीकृत।

सन् 1954

डॉ. कैलाशचन्द्र मिश्र महाविद्यालय के संचालक नियुक्त।

सन् 1955

श्री एम. सुब्रह्मण्यम महाविद्यालय के संचालक नियुक्त।

शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा परिषद् को पूर्ण अनुदान देने की स्वीकृति।

सन् 1959

महाविद्यालय के वार्षिक समारोह में राज्य सभा के उपाध्यक्ष श्री एस. बी. कृष्णमूर्ति राव ने अपने अध्यक्षीय भाषण में संस्था को राष्ट्रीय शिक्षा का गुरुकुल बताया और कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में इसे महत्व मिलना चाहिए।

19 मार्च, सन् 1960

शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा अखिल भारतीय हिंदी शिक्षण महाविद्यालय की आगरा में स्थापना।

महाविद्यालय के संचालन के लिए केंद्रीय हिंदी शिक्षण मण्डल का गठन। श्री मोटूरि सत्यनारायण मण्डल के अध्यक्ष मनोनित।

1 नवंबर, सन् 1960

सोसायटीज़ एक्ट में मण्डल का पंजीकरण।

30 अप्रैल,सन् 1961

केंद्रीय  हिंदी शिक्षण मण्डल की प्रथम बैठक आयोजित। बैठक में हिंदी शिक्षण प्रवीण, हिंदी शिक्षण पारंगत और हिंदी शिक्षण निष्णात पाठ्यक्रम संचालित करने का निर्णय।

27 अक्टूबर, सन् 1961   

मंडल की प्रबंध परिषद् की बैठक आयोजित। बैठक में विकास समिति का गठन।

सन् 1961-62

महाविद्यालय में "हिंदीतर भाषी प्रदेशों में हिंदी सीखने की समस्याएँ" विषय पर संगोष्ठी आयोजित।

मण्डल के निर्णयानुसार हिंदी शिक्षण प्रवीण, हिंदी शिक्षण परंगत और हिंदी शिक्षण निष्णात पाठ्यक्रमों का संचालन।

छात्रों की वार्षिक पत्रिका "समन्वय" का प्रकाशन प्रारंभ।

अर्धवार्षिक शोध पत्रिका "गवेषणा" का प्रकाशन प्रारंभ।

सन् 1962

महाविद्यालय के प्रथम निदेशक के रूप में डॉ. विनय मोहन शर्मा द्वारा मई, सन् 1962 में कार्यभार ग्रहण।

श्री मोटूरि सत्यनारायण का मण्डल के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र। श्री बालकृष्ण राव मण्डल के अध्यक्ष मनोनीत।

डॉ. विनय मोहन शर्मा का निदेशक पद से त्यागपत्र।

सन् 1963

फ़रवरी, सन् 1963 में डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा द्वारा महाविद्यालय के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

अखिल भारतीय हिंदी शिक्षण महाविद्यालय का नाम बदलकर 'केंद्रीय हिंदी संस्थान' किया गया।

"सार्वदेशिक हिंदी का भावी रूप" विषय पर संगोष्ठी का आयोजन। संस्थान में अनुसंधान कार्यो का आरंभ।

सन् 1964-65

"साहित्य में बाह्म प्रभाव-भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में" विषय पर संगोष्ठी का आयोजन।

हिंदी साहित्य, भाषा विज्ञान और शिक्षाशास्त्र से संबंधित विषयों पर प्रसार व्याख्यानों का प्रारंभ।

 

संस्थान के भवन के लिए आगरा में 15 एकड़ भूमि का अधिग्रहण।

 सन् 1965-66

 हिंदीतर भाषा, भाषी राज्यों के सेवारत हिंदी अध्यापकों के लिए एक मासीय पुनश्चर्या/नवीकरण पाठ्यक्रम शुरू।

 सन् 1966-67    

 संस्थान द्वारा शोध कार्यों का प्रकाशन प्रारंभ। "भारतीय भाषाओं का भाषाशास्त्रीय अध्ययन" और "भारतीय साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन" छात्रों के लघु शोध प्रबंध प्रकाशित।

तमिल, तेलगु, कन्नड़ और मलयालम के प्राथमिक स्तर के छात्रों की पाठ्य पुस्तकें निर्मित।

 सन् 1967-68

 संस्थान में शिक्षाशास्त्र विभाग, शैक्षणिक भाषाविज्ञान विभाग, साहित्य विभाग, अनुसंधान एवं सामग्री निर्माण विभाग और प्रसार विभाग स्थापित।

"भाषा शिक्षण में भाषाविज्ञान का योगदान" विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।

 सन् 1968-69

संस्थान में विभागों का पुनर्गठन-अनुसंधान एवं प्रसार विभाग, भाषा और शैक्षणिक विभाग, शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान विभाग एवं साहित्य एवं प्रकाशन विभाग बनाए गए।

संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्यो की समीक्षा करने के लिए मण्डल द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा, जिसके सदस्य प्रो. एस.एम कत्रे, प्रो. बाबूराम सक्सैना और प्रो. आर्येन्द्र शर्मा थे, 6 अगस्त, सन् 1968 को संस्थान का निरीक्षण।

संस्थान के कार्यो की प्रशंसा करते हुए समिति ने संस्थान को विश्वविद्यालय की मान्यता देने की संस्तुति।

 सन् 1969-70

 मंत्रालय द्वारा निम्न योजनाएँ स्वीकृत-

1- अहिंदी भाषी क्षेत्रों के हिंदी जानने वाले अन्य विषयों के प्रशिक्षित अध्यापकों के लिए एक वर्षीय गहन हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम।

2- विदेशियों का गहन पाठ्यक्रम के द्वारा शिक्षण-प्रशिक्षण।

3- हिंदी अनुवाद पाठ्यक्रम।

4- भाषा प्रयोगशाला का स्थापना।

अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी-शिक्षण की समस्याओं के सर्वेक्षण पर कार्य प्रारंभ।

 

सन् 1970-71    

दिल्ली केंद्र की स्थापना।

गृहमंत्रालय, भारत सरकार की योजना के अंतर्गत राजभाषा विभाग के अधिकारियों के लिए तीन मासीय गहन हिंदी- शिक्षण पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

विदेशियों के लिए गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम प्रारंभ। दिल्ली में स्थित विदेशी राजदूतावासों के अनुरोध पर विदेशियों के हिंदी शिक्षण के लिए सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों का आयोजन।

मुख्यालय आगरा में हिंदीतर राज्यों के हिंदी न जानने वाले प्रशिक्षित अध्यापकों के लिए एक वर्षीय गहन हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का शुभारंभ।

गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम के लिए पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-सामग्री का निर्माण।

आगरा मुख्यालय में ध्वनि विज्ञान एवं भाषाप्रयोगशाला स्थापित करने की कार्य-योजना तैयार।

पूर्वांचल के लिए मानक हिंदी शिक्षण के लिए कैसेट्स तैयार।

'संस्थान बुलेटिन (त्रैमासिक) के प्रकाशन का शुभारंभ।

मैसूर विश्वविद्यालय की ओर से संस्थान को अनुसंधान केंद्र की मान्यता।

सन् 1971-72    

भाषाप्रयोगशाला (12 बूथ की प्रयोगशाला आगरा में तथा 6 बूथ की प्रयोगशाला दिल्ली केंद्र में स्थापित की गई)। कंप्यूटर-केंद्र, दृश्य-श्रव्य कक्ष, ध्वनि विज्ञान प्रयोगशाला, मनोविज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना।

आगरा मुख्यालय के कंप्यूटर केंद्र, दृश्य-श्रव्य कक्ष में रंगीन टी.वी., वी.सी.आर, ध्वनि विस्तारक यंत्र सूमह, प्री-रिकार्डिंग सुविधा, ओवर-हेड़ प्रोजेक्टर, स्लाइड़-प्रोजेक्टर की स्थापना।

 

सन् 1972-73    

शिक्षण-सामग्री-निर्माण एकक की स्थापना।

 

दिल्ली केंद्र में विदेशियों के लिए पूर्णकालिक पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

हिंदी के प्रसिद्घ कवियों की कविताओं की कैसेट्रस उन्हीं के स्वर में टेपांकित।

राजभाषा के गहन हिंदी शिक्षण कार्यक्रम की सामग्री का प्रकाशन।

विश्वविद्यालय के अध्यापकों के लिए उच्चनवीकरण कार्यक्रम की सामग्री तैयार तथा दो पाठ्यक्रम संपन्न।

निदेशक प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा द्वारा पूर्वांचल के हिंदी- शिक्षण और अध्यापकों का विशेष अध्ययन दौरा। फलस्वरूप पूर्वांचल के मिजोरम एवं नागालैंड के विशेष गहन पाठ्यक्रम विकसित।

गृहमंत्रालय राजभाषा विभाग की हिंदी-शिक्षण-योजना के अंतर्गत गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम को मातृभाषा के आधार पर दो वर्गो में विभाजन-त्रिमासीय (दक्षिण के लिए) तथा द्विमासीय (अन्य हिंदीतर भाषियों के लिए)।

हिंदीतर भाषी संसद सदस्यों के लिए कंपोजिट हिंदी-शिक्षण-स्वाध्याय पाठ्यक्रम का कार्य प्रारंभ।

 

सन् 1973-74    

केंद्रीय हिंदी संस्थान तथा कन्हैयालाल मुंशी भाषाविज्ञान विद्यापीठ, आगरा और लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में अखिल भारतीय भाषाविज्ञान सम्मेलन का आयोजन। 165 भाषाविदों ने भाग लिया। अधिकांश लेख हिंदी में पढ़े गए।

 

'अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज' और केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में विदेशियों के लिए ग्रीष्मकालीन भाषा शिविर आयोजित।

'हिंदी शिक्षण पारंगत पाठ्यक्रम' का पुनरीक्षण। इसमें नए विषयों का समायोजन।

केरल के तीन विश्वविद्यालयों के हिंदी प्राध्यापकों के लिए उच्चनवीकरण पाठ्यक्रमों का आयोजन।

पूर्वांचल राज्यों के हिंदीतर भाषी शिक्षकों के लिए 'विशेष गहन हिंदी-शिक्षण-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम प्रारंभ।

'अखिल भारतीय कैथोलिक स्कूल संगठन के अनुरोध पर आगरा में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी शिक्षण विषय पर एक संगोष्ठी अयोजित।

 सन् 1974-75 संस्थान के निदेशक प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा सेवानिवृत्त और प्रो. गोपाल शर्मा द्वारा संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

 

संस्थान को आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य और भाषाविज्ञान विषय पर पी.एच.डी. अनुसंधान के लिए मान्यता प्राप्त।मैसूर और आगरा विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. अनुसंधान के लिए 9 शोधार्थियों का पंजीकरण।

मॉस्को विश्वविद्यालय और यू.एस.ए. के एक-एक शोधार्थी द्वारा आगरा में अनुसंधान कार्य प्रारंभ।

दिल्ली केंद्र में पोस्ट एम.ए. अनुप्रयुक्त हिंदी भाषाविज्ञान डिप्लोमा पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

संस्थान के दिल्ली केंद्र में भारत सरकार के सचिवालय प्रशिक्षण और प्रबंधन संस्थान के प्रोविश्नर्स के लिए हिंदी भाषा और कार्यालयीन हिंदी के एक मासीय पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

नागालैंड़, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश की हिंदी की पाठ्यपुस्तकों और उनकी सहायक सामग्री का निर्माण।

 

सन् 1975-76    

बैंक अधिकारियों के लिए बैंकिंग हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित। पाठ्यक्रम की शिक्षण सामग्री संस्थान द्वारा तैयार।

गृहमंत्रालय, भारत सरकार के राजभाषा विभाग की हिंदी शिक्षण योजना के हिंदी प्राध्यापकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हिंदी अध्यापकों के लिए विशिष्ट हिंदी पाठ्यक्रम संपन्न।

हिंदी में उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका के विसकौंसिन विश्वविद्यालय की एक छात्र और ओसाका विश्वविद्यालय के एक अध्यापक का विशेष अध्ययन के लिए आगमन।

'अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज' और संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में ग्रीष्मकालीन भाषा शिविर आयोजित।

भारत-फ्रांस सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत संस्थान द्वारा फ्रांस के विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने की योजना का शुभारंभ।

'बैंकिंग हिंदी' पाठ्यक्रम के अंतर्गत शिक्षण-सामग्री का विकास और 7 पुस्तकों की सामग्री तैयार।

'भारतीय द्विभाषिकता' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।

संस्थान के हिंदी शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान, दीमापुर के अध्यापकों केा प्रशिक्षित करने के लिए एक चतुर्थवर्षीय पाठ्यक्रम एवं उसकी सामग्री का निर्माण।

 

सन् 1976-77    

संस्थान के दो नए केंद्रों की स्थापना-दक्षिण भारत में हैदराबाद केंद्र तथा पूर्वोत्तर में शिलांग केंद्र की स्थापना।

हिंदी-शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान, दीमापुर में हिंदी-शिक्षण डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारंभ। चतुर्थ वर्ष के हिंदी अध्यापकों का प्रशिक्षण हेतु आगरा आगमन।

अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज' के लिए ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम का संचालन।

सन् 1977-78    

हिंदी शिक्षण पारंगत पाठ्यक्रम को पत्राचार माध्यम से संचालित करने की योजना स्वीकृत और इसकी शिक्षण-सामग्री का निर्माण।

शिलांग केंद्र में 'असम राइफल्स' के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम प्रारंभ।

संस्थान के मुख्यालय के लिए भवन-निर्माण का कार्य प्रारंभ।

शिलांग में 'असम राइफल्स' के लिए 'गहन हिंदी प्रशिक्षण प्रमाण पत्र' पाठ्यक्रम आयोजित।

कोचीन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अध्यापकों के लिए कॉलेज स्तर पर हिंदी अध्यापन को आधुनिक और वैज्ञानिक बनाने के लिए पाठ्यक्रम आयोजित।

पूर्वांचल के प्रशिक्षित अध्यापकों के लिए सुधारात्मक पाठ्यक्रम आयोजित।

'लद्दाखी भाषा का समाज-भाषा वैज्ञानिक अध्ययन' परियोजना पर कार्य प्रारंभ।

सन् 1978-79

संस्थान में प्रकाशन विभाग की स्थापना और प्रकाशन प्रबंधक की नियुक्ति।

हैदराबाद केंद्र पर डाकतार विभाग के पोस्ट मैन/डाकिया के लिए देवनागरी लिपि-हस्तलेख पढ़ने का प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित।

राजभाषा विभाग की हिंदी शिक्षण योजना की प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय सत्र की पाठ्य-सामग्री का निर्माण।

सन् 1979-80

31 मई, सन् 1979 को डॉ. गोपाल शर्मा संस्थान के निदेशक पद से मुक्त। 1 जून, सन् 1979 से 30 दिसंबर, 79 तक प्रो. रामनाथ सहाय ने निदेशक पद का कार्यभार संभाला।

31 दिसम्बर, सन् 1979 

प्रो. बालगोविन्द मिश्र द्वारा संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

संस्थान मुख्यालय का अपने नव-निर्मित भवन में प्रवेश।

संस्थान का शिलांग केंद्र गुवाहाटी स्थापनांतरित।

दक्षिण भारत के हिंदी प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्राध्यापकों के लिए उच्च नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित।

सचिवालय प्रशिक्षण और प्रबंधन संस्थान, भारत सरकारर के नव नियुक्त परिवीक्षाधीन अधिकारियों के लिए कार्यालयी हिंदी के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का आयोजन।

हिंदी प्रयोग से संबधित समाज-भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए एक सलाहकार समिति की बैठक आयोजित जिसमें समाज-भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण कार्य केंद्रीय हिंदी संस्थान को सौंपा गया।

कार्यालयी हिंदी संप्रेषणात्मक व्याकरण और हिंदी प्रयोगों के निर्माण हेतु एक सलाहकार समिति की बैठक आयोजित और संस्थान को इस परियोजना पर कार्य करने की संस्तुति।

जनजातीय बहुल राज्यों के हिंदी शिक्षण केंद्रों को नि: शुल्क पुस्तक वितरण का कार्य संस्थान द्वारा संपन्न।

असम, मणिपुरी, नागालैंड़ और मिजोरम के हिंदी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों में चलने वाले पाठ्यक्रम संस्थान से संबद्घ। इनकी परिक्षाएं संस्थान द्वारा संचालित।

सन् 1980-81   

दिल्ली केंद्र में पोस्ट एम.ए. अनुवाद : सिद्घांत एवं व्यवहार डिप्लोमा पाठ्यक्रम का शुभारंभ। इसी वर्ष से दिल्ली केंद्र पर 'पोस्ट एम.ए. अनुप्रयुक्त हिंदी भाषाविज्ञान उच्च डिप्लोमा पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों के हिंदी प्राध्यापकों के लिए उच्च नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित।

भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों मं प्रयुक्त प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ की परीक्षाओं की पाठ्य-सामग्री संस्थान द्वारा संपादित।

संस्थान ने मध्य प्रदेश की पाँच जन-जातियों-गोंडी, भीली, कोरकू, कुडुख और हल्वी बोलियों का भाषावैज्ञानिक विश्लेषण और शिक्षण-सामग्री का निर्माण।

'हिंदी शिक्षण पारंगत (पत्राचार) पाठ्यक्रम की शिक्षण-सामग्री का संपादन।

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संस्थान के निदेशक प्रो. बालगोविन्द मिश्र की क्षेत्रीय भाषा केंद्र सिंगापुर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रतिनियुक्ति।

यूनेस्को द्वारा संचालित एशिया एवं पैसिफिक द्वीप समूह के बहुभाषीय संदर्भ में आयोजित संगोष्ठी में मंत्रालय द्वार प्रो. बालगोविन्द मिश्र की प्रतिनियुक्ति।

सन् 1981-82

हिंदी शिक्षण पारंगत (पत्राचार) पाठ्यक्रम का शुभारंभ।

सन् 1982-83   

'लद्दाखी कन्वर्सेशन' एवं 'लद्दाखी ग्रामर' पुस्तकों का प्रकाशन।

सन् 1983-84

कालीकट विश्वविद्यालय के हिंदी प्राध्यावकों के लिए उच्च नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित।

स्माज-भाषाविज्ञान सर्वेक्षण विभाग की स्थापना और भाषा 'अनुरक्षण एवं भाषा विस्थापन' शोध परियोजना प्रारंभ।

संस्थान से संबद्घ प्रशिक्षण संस्थान के छात्राध्यापकों के लिए 'हिंदी भाषा शिक्षा संचेतना शिविर का आयोजन।

सन् 1984-85  

अखिल भारतीय हिंदी परियोजना, वाणिज्य व्यापार की हिंदी परियोजना, औद्यौगिक प्रतिष्ठानों का समाज-भाषावैज्ञानिक परियोजनाओं का शुभारंभ।

जनजातीय भाषा एवं अनुसंधान और शिक्षण-सामग्री-निर्माण एककों की स्थापना।

भाषा प्रौद्योगिकी एवं दृश्य-श्रव्य एकक की स्थापना।

विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण सामग्री का निर्माण।

भाषा-विकास-प्रकल्प मुंबई के लिए संस्थान का गुजराती और मराठी भाषियों के लिए हिंदी पाठ्यक्रमों के लिए सामग्री-निर्माण और टेपांकन कार्य संपन्न।

डॉ. मारिया न्येज्येसी, बुडापेस्ट विश्वविद्यालय, हंगेरी द्वारा संस्थान में रहकर हंगेरी में हिंदी पढ़ाने के लिए शिक्षण-सामग्री विकसित की।

विश्वविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षण सामग्री-कहानी संग्रह, एकांकी संग्रह, निबंध संग्रह और काव्य संग्रह का निर्माण।

प्रयोजनमूलक हिंदी तथा समाज भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण एकक की स्थापना।

सन् 1985-86   

मैसूर के राजकीय हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय को संस्थान द्वारा संबद्घता प्रदान।

मेघालय और अन्यू पूर्वोत्तर राज्यों की माँग पर शिलांग में केंद्र खोलने का निर्णय।

संस्थान द्वारा नागा-मिजो और मणिपुरी भाषियों के लिए उच्चारण पाठ तैयार।

आगरा मुख्यालय एवं दिल्ली केंद्र में द्विभाषिक शब्द संसाधन कंप्यूटर कक्षों की स्थापना।

'संकाय संवर्द्घन कार्यक्रम' का आयोजन।

सन् 1986-87

पूर्वोत्तर राज्यों की मांग पर शिलांग केंद्र की स्थापना।

राउरकेला, बोकारो, विशाखापट्टनम, गोवा के औद्यौगिक क्षेत्रों में मौखिक-भाषा सामग्री-संकलन और लिप्यंकन।

उत्तर प्रदेश कर्मचारी चयन आयोग के लिए प्रश्न-पत्र तैयार करने का कार्य।

गुजरात के प्रशिक्षण महाविद्यालय और एम.एन.डी.टी. महाविद्यालय, मुंबई के हिंदी अध्यापकों के लिए उच्च नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित।

कालीकट विश्वविद्यालय और एस.एन.डी.टी. महाविद्यालय, मुंबई के हिंदी पाठ्यक्रमों को भाषापरक बनाने के लिए पुनश्चर्या कार्यक्रमों का आयोजन।

नागालैंड़ के शिक्षा विभाग के अनुरोध पर कक्षा 5, 6, 7 एवं 8 की कक्षाओं की हिंदी पाठ्यपुस्तकों का पुनरीक्षण।

लद्दाखी परियोजना के अंतर्गत (लद्दाखी ग्रामर, कनफ्लिक्टिंग फोनोलोजिकल पैटनर्स) लद्दाखी फोनोलॉजी, लद्दाखी ग्रामर पुस्तकें प्रकाशित।

सन् 1987-88    

राउरकेला, विशाखापट्टनम, बोकारो और गोवा के प्रौद्यौगिक क्षेत्रों में संपर्क भाषा के रूप में उभरती हिंदी के भारत व्यापी रूप को निर्धारित करने का प्रारंभिक प्रारूप तैयार।

सन् 1988-89  भारत सरकार के इलैक्ट्रॉनिक विभाग के अनुदान पर दिल्ली केंद्र में कंप्यूटर द्वारा विदेशी भाषा के रूप में हिंदी-भाषा-शिक्षण तथा सर्जनात्मक लेखन परियोजना प्रारंभ। कंप्यूटर के माध्यम से भाषा शिक्षण पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार और पुस्तकाकार रूप में प्रकाशन।

मैसूर केंद्र की स्थापना

मंडल की शासी परिषद् में संस्थान की रजत जंयती समारोह को मनाने के लिए नई समिति का गठन।

13 फरवरी, सन् 1989

भारत के प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी द्वारा विज्ञान भवन, नई दिल्ली में संस्थान की रजत जंयती समारोह का उद्घाटन।

अखिल भारतीय हिंदी सेवी सम्मान योजना के अंतर्गत रजत जंयती के अवसर पर 25 हिंदी विद्वान-गंगाशरण सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, आत्माराम एवं सुब्रह्मण्य भारतीय पुरस्कारों से सम्मानित।

रजत जंयती वर्ष में अखिल भारतीय हिंदी सेवा सम्मान योजना के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी प्रचार-प्रसार करने वाले हिंदी विद्वानों को प्रतिवर्ष पुरस्कृत करने का निर्णय।

रजत जंयती वर्ष में 25 मोनोग्राफ तैयार करने का संकल्प।

सन् 1989-90

रजत जंयती वर्ष में हर केंद्र पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, कवि सम्मेलन आयोजित। रजत जंयती ग्रंथ तैयार करने का कार्य सम्पन्न।

सन् 1990-91    

रजत जंयती वर्ष ग्रंथ प्रकाशित।

19 अप्रैल, सन् 1991

फिक्की ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा रजत जंयती वर्ष समापन समारोह संपन्न।

जनसंचार पाठ्यक्रम की द्विभाषिक/बहुभाषिकता से संबधित सामग्री का संकलन।

सितम्बर, सन् 1991

लेह (लद्दाख) में हिंदी शिक्षकों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित।

कंप्यूटर संसाधित विदेशी भाषा के रूप में हिंदी अधिगम और प्रशिक्षण परियोजना के लिए भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक विभाग द्वारा संस्थान को वित्तीय सहायता।

दिल्ली केंद्र के सहयोग से आई.आई.टी. दिल्ली में कारपोरा परियोजना का शुभारंभ। संस्थान द्वारा परियोजना का संचालन।

नवोदय विद्यालय में मानविकी के विषयों को पढ़ाने वाले अध्यापकों को माध्यम परिवर्तन में प्रशिक्षण।

संस्थान की समस्त कार्य प्रणाली के निरीक्षण और सुधार के लिए आवश्यक संस्तुति हेतु एक समीक्षा समिति, प्रो. कल्याणमल लोढ़ा की अध्यक्षता में गठित।

समिति द्वारा संस्थान के मुख्यालय और सभी केंद्रों की निरीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत।

अक्टूबर, सन् 1991

प्रो. बालगोविन्द मिश्र संस्थान के निदेशक पद से सेवानिवृत्त। प्रो. अमर बहादुर सिंह द्वारा कार्यकारी पद का कार्यभार ग्रहण।

सन् 1991-सन् 1992

21 जुलाई, सन् 1991 को प्रो. महावीर सरन जैन द्वारा संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

भारत सरकार का विदेशों में हिंदी का प्रचार-प्रसार योजना से संबधित छात्रवृत्ति पर विदेशों से आने वाले छात्रों का पाठ्यक्रम दिल्ली से आगरा स्थापनांतरित।

संस्थान के प्राध्यापकों और कर्मचारियों के लिए आवास और अतिथि भवन का निर्माण संपन्न। गांधी भवन विदेशी छात्रों की कक्षाओं एवं पुस्तकालय के लिए निर्मित।

सन् 1992-93

हिंदीतर भाषा एवं विदेशी छात्रों के भाषा शिक्षण के लिए वीडियो फिल्मों का निर्माण।

संकाय संवर्धन कार्यक्रम के अंतर्गत भाषा प्रौद्यौगिकी पाठ्यक्रम और कंप्यूटर परिचय पाठ्यक्रम आयोजित।

मध्य प्रदेश के जनजातीय शिक्षकों के लिए 4 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित।

सन् 1993-94    

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नावार्ड) लखनऊ की मांग पर उनके सेवारत अधिकारियों को दूरस्थ शिक्षा माध्यम से हिंदी सीखने की सामग्री का निर्माण कार्य प्रारंभ।

कंप्यूटर परिचय पाठ्यक्रम अध्यापकों के लिए आयोजित।

विडियो आलेख निर्माण कार्यशाला 7 मार्च से 11 मार्च, 94 तक आयोजित।

असम, उड़ीसा एवं महाराष्ट्र की पाठ्य पुस्तकों पर आधारित विडियो आलेख निर्माण कार्यशाला आयोजित।

विदेशी भाषा के रूप में हिंदी भाषा का कंप्यूटर साधित अध्ययन एवं शिक्षण परियोजना का कार्य संपन्न और मूल्यांकन के लिए इलैक्ट्रोनिक विभाग को सौंपा।

सन् 1994-95

अखिल भारतीय हिंदी सेवी सम्मान योजना के अंतर्गत विदेशी हिंदी सेवी विद्वान को डा. जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार नाम से प्रति वर्ष पुरस्कार दिए जाने का प्रस्ताव पारित।

सन् 1995-96

गुवाहाटी केंद्र द्वारा पावर ग्रिड़ कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड़ के पूर्वांचल क्षेत्र के अधिकारियों के लिए तीन कार्यशालाओं का आयोजन।

सन् 1996-97

नागालैंड़ के हिंदी शिक्षण डिप्लोमा पाठ्यक्रम की पाठ्य-पुस्तक का संशोधन, परिवर्द्घन संपन्न। पाण्डुलिपि प्रकाशनार्थ नागालैंड़ सरकार को सौंपी।

नागालैंड़ शिक्षा बोर्ड की कक्षा 9 से 10 की हिंदी पाठ्यपुस्तकों का निर्माण कार्य प्रारंभ।

सन् 1997-98    

बैंकिग हिंदी की शिक्षण-सामग्री का संशोधन, परिवर्द्घन एवं परिमार्जन कार्य संपन्न। पाण्डुलिपि प्रेस में भेजी।

कर्नाटक राज्य के हाई स्कूल और उच्चतर प्राइमरी कक्षाओं के अध्यापकों के लिए हिंदी शिक्षण माड्यूल तैयार।

सन् 1998-99

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से स्नातक स्तर के प्रयोजनमूलक हिंदी पाठ्यक्रम सिलेबस का पुर्नगठन/संशोधन कर अद्यतन रूप प्रदान किया।

हिंदी-लुशाई शब्दकोश की पाण्डुलिपि तैयार।

सन् 1999-2000

हिंदी कार्पोरा की टेंगिग परियोजना ई आर डी सी आई के सहयोग से प्रारंभ। कार्पोरा की टेंगिग के कार्य संपादन की योजना तैयार करने को दो कार्यशालाएँ आयोजित।

2000-2001

हिंदी विश्व-कोश को इंटरनेट पर प्रस्तुत करने की योजना से संबधित सामग्री 6 खण्डों में तैयार। इसके तैयार जीरो वर्जन का विमोचन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी द्वारा संपन्न।

भाषा सेतु त्रैमासिक समाचार बुलेटिन का प्रथम अंक प्रकाशित।

31 जनवरी, 2001

प्रो. महावीर सरन जैन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त। श्रीमती बेला बैनर्जी, संयुक्त सचिव (भाषाएँ), मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संस्थान के निदेशक का कार्यवाहक कार्यभार फरवरी, 2001 में ग्रहण।

2001-2002

पूर्वांचल की जनजातीय भाषाओं - हिंदी-आदि' (अरूणाचल), हिंदी-गारो' (मेघालय), 'हिंदी-मणिपुरी' (मणिपुर) के कोश निर्माण का कार्य और हिंदी अध्येताओं के लिए 4000 शब्दों का कोश तैयार करने के लिए कार्य प्रारंभ।

आई.आई.आई.टी. हैदराबाद के सहयोग से मशीनी-अनुवाद-संवाद कार्यशाला आयोजित।

अखिल भारतीय हिंदी सेवी सम्मान योजना के अंतर्गत डा. जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार के अंतर्गत एक विदेशी और एक भारतीय मूल के विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पुरस्कृत करने का निर्णय।

'संस्थान समाचार' मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ।

2002-2003

संस्थान में चलने वाले पत्रकारिता पाठ्यक्रम के छात्रों के लिए न्यूज रीडिंग से संबधित सी.डी., संस्थान एक परिचय मल्टीमीडिया सी.डी. और कक्षाध्यापन सी.डी. निर्माण। अंतर्राष्ट्रीय मानक हिंदी पाठ्यक्रम, सामग्री व सी.डी. निर्माण।

पोस्ट एम.ए. जनसंचार एवं पत्रकारिता डिप्लोमा पाठ्यक्रम मुख्यालय आगरा में प्रारंभ।

13 मार्च, 2002

प्रो. नित्यानंद पाण्डेय ने संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण किया।

2003-2004 

अगस्त, 2003 में दीमापुर (नागालैंड) केंद्र की स्थापना। केंद्र द्वारा हिंदी शिक्षण प्रवीण और विशेष गहन हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम का संचालन।

2004-2005

भुवनेश्वर केंद्र की स्थापना। केंद्र पर 6 नवीकरण पाठ्यक्रम चलाए गए और राजभाषा विभाग का सम्मेलन आयोजित।

प्रो. नित्यानंद पाण्डेय का निदेशक पद का कार्यकाल समाप्त। पुन: श्रीमती बेला बैनर्जी, संयुक्त सचिव (भाषाएँ) द्वारा कार्यवाहक निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

अगस्त, 2004

अंतर्राष्ट्रीय महिला छात्रावास का निर्माण।

2005-2006     

23 मार्च, 2005 को प्रो. शंभुनाथ साव द्वारा संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार ग्रहण।

31 मार्च, 2006 को संस्थान के अहमदाबाद केंद्र की स्थापना।

2006-2007

8 जुलाई, 2006 को मुख्यालय के सभागार का नजीर सभागर के रूप में नामकरण।

27 जुलाई को, 2006 में अध्यक्ष द्वारा हिंदी से संबंधित एक राष्ट्रीय संग्राहलय बनाने का निर्णय।

संस्थान को मानद विश्वविद्यालय बनाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए एक समिति का गठन।

संस्थान के सभी पाठ्यक्रमों का संशोधन कार्य संपन्न।

हिंदी कार्पोरा योजना के अंतर्गत दो करोड़ शब्द-रूपों का संकलन।

संस्थान के विदेशी और अन्य छात्रों के उपयोगार्थ 4 साइबर कैफे स्थापित।

संस्थान के विदेशी छात्रों के लिए योग, भारतीय संगीत और भारतीय नृत्य प्रशिक्षण की नि: शुल्क व्यवस्था।

हिंदी की आधारभूत की निमार्ण योजना, पूर्वोत्तर की 57 जनजातीय क्षेत्रों के साहित्य की सी.डी. निर्माण योजना, हिंदी तथा इसकी 48 बोलियों के शब्दकोशों की निर्माण योजना, पूर्वोत्तर की 57 जनजातीय क्षेत्रों के साहित्य का हिंदी में अनुवाद की योजना और लघु हिंदी विश्वकोश की योजनाओं का शुभाआरंभ।

काबुल विश्वविद्यालय के स्नातक स्तरीय हिंदी पाठ्यक्रम का निर्माण।

2007-2008

13-15 जुलाई को 8वें विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयार्क में संस्थान द्वारा सहभागिता।

यू.एन.ओ. के महासचिव 'वान की मून' द्वारा सम्मेलन का उद्घाटन और संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका, मीडिया और हिंदी साहित्य का इतिहास पुस्तक का विमोचन।

हिंदी शिक्षण पारंगत पत्राचार पाठ्यक्रम के पाठों का पुर्नलेखन और पुनरीक्षण संपन्न।

संस्थान में आयोजित होने वाले प्रसार व्याख्यानों का मूर्धन्य विद्वानों की स्मृति में नामकरण।

बेरोजगारों के लिए रोजगारपरक त्रैमासिक पाठ्यक्रम 'विक्रय एवं विपणन', मार्केटिंग कौशल', हिंदी प्रकाशन तकनीक और प्रूफरीडिंग प्रारंभ।

2008-2009

दिनांक 11 फरवरी, 2008 को (स्व.) श्री मोटूरि सत्यनारायण और डा. राम विलास शर्मा की प्रतिमाओं की संस्थान प्रांगण में स्थापना।

पूर्वोत्तर लोक साहित्य परियोजना के अंतर्गत 40 लोककथाओं का हिंदी अनुवाद संपन्न।

मेघालय राज्य की कक्षा 5 से 7 तक की पाठ्यपुस्तकों का निर्माण संपन्न।

मिजोरम राज्य की कक्षा 5 से 8 तक की पुस्तकें मिजो बोर्ड ऑफ स्कूल एज्यूकेशन को सौंपी।

हिंदी कार्पोरो परियोजना के अंतर्गत हिंदी शब्दावली पुस्तक का प्रकाशन।

सी.डी. निर्माण परियोजना के अंतर्गत 'हिंदी उच्चारण शिक्षण' और 'हिंदी लिपि शिक्षण' विषय की एक मल्टीमिडिया सी.डी., हिंदी की रचना पर आधारित ऑडियो की चार मास्टर सी.डी. तथा सूरदास की रचनाओं की एक ऑडियो सी.डी. का निर्माण।

महादेवी वर्मा के जीवन और व्यक्तित्व पर एक वीडियो वृत्त चित्रा सी.डी. का निर्माण।

27 नवम्बर, 2008

प्रो. शंभुनाथ साव का संस्थान के निदेशक पद का कार्यकाल पूर्ण।

28 नवम्बर, 2008      

प्रो. रामवीर सिंह द्वारा संस्थान के कार्यकारी निदेशक पद का कार्य भार ग्रहण।

2009-10        

भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी शब्द कोश का प्रकाशन।

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग के पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त कठिन शब्दों और अभिव्यक्तियों की चित्रात्मक प्रस्तुति हेतु चित्रा संकलन तथा पाठावली का डिजीटल संस्करण तैयार।

हिंदी शिक्षण निष्णात के कंप्यूटर साधित हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत मल्टीमिडिया भाषा शिक्षण पाठों के रिकार्डो तथा ध्वनि मिश्रण का कार्य संपन्न।

हिंदी शिक्षण निष्णात के छात्रों द्वारा अपना परियोजना कार्य सी.डी. रूप में प्रस्तुत।

2010-11        

30 सिंतबर, 2010 में प्रो. रामवीर सिंह संस्थान के कार्यकारी निदेशक पद से मुक्त।

1 अक्टूबर, 2010          

प्रो. के. बिजय कुमार, अध्यक्ष-वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली द्वारा संस्थान के निदेशक पद का कार्य भार ग्रहण।