सोमवार, अग 26

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सुशासन संगोष्ठी दिनांक 23 दिसंबर, 2014

‘‘सुशासन के प्रोत्साहन में प्रौद्योगिकी एवं नवाचारों का उपयोग’’

केंद्रीय हिंदी संस्थान के सूचना एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग के तत्वावधान में दिनांक 23.12.2014 को सुशासन के प्रोत्साहन में प्रौद्योगिकी एवं नवाचारों के विषय पर एक संगोष्ठी एवं भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्राप्त दिशा निर्देश के अनुपालन में यह संगोष्ठी दिनांक 25 दिसंबर, 2014 को केंद्र सरकार द्वारा घोषित सुशासन दिवस की अनुवृत्ति में आयोजित हुई।
संगोष्ठी का कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था। पहले सत्र में ज़ी न्यूज़ के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर श्री पीयूष पांडेय, आगरा विश्वविद्यालय के बेसिक विज्ञान संस्थान में कंप्यूटर विज्ञान के प्राध्यापक डाॅ. राजकुमार यादव तथा क.मु.हिंदी एवं भाषाविज्ञान विद्यापीठ में कंप्यूटर अनुप्रयोग के प्राध्यापक डाॅ.विकास दिनकर ‘पंडित’ ने इस संगोष्ठी में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा सुशासन के अंतःसंबंधों और उनके बहुआयामी पक्षों पर अपने मौलिक विचार प्रस्तुत किए। समारोह की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक प्रो.मोहन ने की।
संगोष्ठी के आरंभ में पिछले 15 वर्षों से इलैक्ट्राॅनिक पत्रकारिता एवं न्यू मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय पहचान बनाने वाले श्री पीयूष पांडेय ने सुशासन एवं प्रौद्योगिकी विषय पर अपना बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने आज के दौर में भारतीय परिवेश में सोशल मीडिया नेटवर्क के विस्तार का परिचय देते हुए बताया कि किस प्रकार फेसबुक, ट्विटर एवं यू-टयूब आदि ने समाज में संवाद और सुशासन की सार्थक पहल को प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल नेटवर्किंग के इस अत्यंत सफल और सशक्त माध्यम ने जन सामान्य को जागरूक करने का कार्य किया है। इसके माध्यम से उपयोक्ता अपनी बात सीधे शासन के उच्चाधिकारियों तक पहुँचा सकता है। ई-गवर्नेंस सुशासन की दिशा में पारदर्शिता, जिम्मेदारी और जवाबदेही को सुनिश्चित करती है। पीयूष जी ने यह भी बताया कि किस प्रकार जन सामान्य सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने हक की आवाज़ को शासन तक पहुँचाने और विविध लाभ प्राप्त करने के लिए कर सकता है।
आगरा विश्वविद्यालय से पधारे डाॅ.राजकुमार यादव ने तकनीकी की क्षमता के बहुआयामी पक्षों से परिचित कराया और इस बात पर बल दिया कि इसके सही दिशा में इस्तेमाल से देश के सुशासन तंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है। यह राष्ट्रीय गवर्नेंस की ऐसी प्रणाली है जिसके समुचित उपयोग से राष्ट्रीय हित की योजनाओं का लाभ जन सामान्य तक पहुँचाया जा सकता है। जनता और सरकार के बीच स्वस्थ एवं पारदर्शी संवाद को मजबूत बनाया जा सकता है। डाॅ. यादव ने जोर देकर कहा कि ‘‘यदि प्रेस लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ है तो सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में ई-गवर्नेंस लोकतंत्र का पाँचवा स्तम्भ है।’’
डाॅ. विकास दिनकर ‘पंडित’ ने प्रौद्य़ोगिकी और सुशासन के परस्पर संबंध की व्याख्या करते हुए आम जन तक सुशासन की सुविधाओं के संप्रेषण के लिए इनके व्यवहारिक माॅडल भी प्रस्तुत किए। उन्होंने सुशासन की दिशा में एकल खिड़की योजना की अवधारणा को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि सुशासन के तहत सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ जरूरतमंद आम आदमी को मिलना चाहिए। सुशासन की पहली सीढ़ी है जनता और सरकार के बीच सीधा संवाद। डाॅ. पंडित ने सुशासन के मानकों को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार की पहल की सराहना की और इस तथ्य को रेखांकित किया कि सरकार का आकार छोटा हो लेकिन सुशासन का आधार व्यापक होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब जनता और सरकार के बीच ई-गवर्नेंस के अलावा किसी दूसरे माध्यम या बिचैलिए की आवश्यकता नहीं है।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में सुशासन को केंद्र में रखकर संस्थान के विभिन्न अकादमिक विभागों के विद्यार्थियों तथा कार्मिकों के लिए एक भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने बड़े ही उत्साह से बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। प्रतियोगिता के निर्णायक डाॅ. विकास दिनकर ‘पंडित’, डाॅ. राजकुमार यादव और श्री अनुपम श्रीवास्तव थे। निर्णायक समिति ने उत्तम भाषण के लिए संस्थान के अध्यापक शिक्षा विभाग के पारंगत पाठ्यक्रम के छात्र श्री हृषिकेश हंस को प्रथम, संस्थान कार्मिक श्री राजधर पाल को द्वितीय और नवीकरण एवं भाषा प्रसार विभाग की प्रतिभागी सुश्री सलमा (राजकीय शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय, मैसूर) को तृतीय पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग से म्यंमार देश के प्रतिभागी छात्र श्री शंकर कुमार यरना को विशेष सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया। सभी विजयी प्रतिभागियों को निदेशक महोदय ने पुरस्कार प्रदान किए।
संगोष्ठी के अंत में निदेशक महोदय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में इस कार्यक्रम को अत्यंत सफल एवं उत्साहवर्धन बताते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी के विकास से सरकार और जनता के बीच स्वस्थ संवाद कायम होगा और सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ जन-जन तक पहुँचेगा। उन्होंने बताया कि किस प्रकार आज ई-गवर्नेंस की सुविधाओं के आने के बाद राजधानी की विशेषज्ञता का लाभ दूरदराज अंचल तक पहुँच रहा है और दूरदराज क्षेत्रों की आवाज जो कभी शासन सत्ता तक नहीं पहुँच पाती थी आज सूचना प्रौद्योगिकी के बलबूते सुनी भी जा रही है और समझी भी जा रही है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें अपने-अपने कार्यक्षेत्र और कार्यालयों में ई-गवर्नेंस और ई-रिसोर्स को मजबूत करना होगा। तभी इस प्रकार की संगोष्ठियों का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
संगोष्ठी आयोजन की रूपरेखा तय करने वाले शैक्षिक समन्वयक प्रो. हरीशंकर ने कहा कि यह संगोष्ठी सुशासन और प्रौद्योगिकी के बहुआयामी संबंधों की दिशा में नये निहितार्थों को समझने और समझाने में सफल हुई है। सूचना तथा भाषा प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर अनुपम श्रीवास्तव ने प्रौद्योगिकी और सुशासन की आधारभूत संरचना और इन दोनों में परस्पर सहयोग और संवाद की संभावना की व्याख्या करते हुए ‘‘सुशासन प्रौद्योगिकी’’ की अवधारणा पर मौलिक विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम संयोजक एवं सूचना तथा भाषा प्रौद्योगिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो.देवेंद्र शुक्ल ने अपने वक्तव्य में इस बात पर बल दिया कि सुशासन और प्रौद्योगिकी की व्यापक साझेदारी और समझदारी की नई जमीन तैयार करने में हिंदी और सभी राष्ट्रीय भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। सुशासन का लाभ अंतिम जन तक तभी पहुँचेगा जब शासन की भाषा जनता की भाषा होगी और जनता की भाषा शासन की भाषा होगी।
संस्थान के कुलसचिव डाॅ.चंद्रकांत त्रिपाठी ने संगोष्ठी में आए सभी आगंतुक विद्वजनों, संस्थान परिवार के सदस्यों और प्रतिभागी छात्र-छात्राओं को इस कार्यक्रम में सहभागिता करने के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो.देवेंद्र शुक्ल ने किया।