सोमवार, दिस 16

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अंतरराष्ट्रीय सहयोग

 

केंद्रीय हिंदी संस्थान का अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण फलक  

 


केंद्रीय हिंदी संस्थान राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हिंदी शिक्षण का एक प्रमुख संस्थान है। पिछले लगभग 50 वर्षों से अधिक समय से लगातार संस्थान ने द्वितीय भाषा शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्रविधि में विशेषज्ञता अर्जित की है। विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में भी संस्थान को दुनिया के एक प्रमुख और विश्वसनीय संस्थान के तौर पर प्रतिष्ठा हासिल है।  यही कारण है कि दुनिया के 80 से अधिक देशों से विद्यार्थी संस्थान आकर हिंदी पढ़ चुके हैं और पढ़ना पसंद करते हैं। हर साल लगभग 35 देशों के 200 से अधिक विद्यार्थी संस्थान के आगरा मुख्यालय और दिल्ली केंद्र में आकर हिंदी सीखते हैं। 


हिंदी का अंतरराष्ट्रीय प्रसार 


आज विश्व के लगभग 100 देशों में या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होता है या फिर इन देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। एशिया महाद्वीप में भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यंमार (बर्मा), चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, उजबेकिस्तान, ताजिकस्तान, तुर्की और थाइलैंड देशों में हिंदी अध्ययन-अध्यापन की पुरानी परंपराएँ हैं। इसके अलावा दुनिया भर के तमाम देशों में अलग-अलग तरीक़े से अपने अनेक रूप, अनेक नाम, अनेक कारणों और अनेक प्रयोजनों के साथ अपनी ज़रूरत और मौजूदगी दर्ज कराती है।

आज जिस प्रकार दुनिया भर में अनेक कारणों से हिंदी सीखने-सिखाने की माँग बढ़ी है, उससे इस भाषा को देखने-परखने की दृष्टि में उल्लेखनीय बदलाव आया है। भाषा-शिक्षण के सरोकारों में हिंदी की उभरती पहचान इसका एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण विश्व बिरादरी और विश्व बाज़ार में भारत की उभरती हुई पहचान है।

सन् 1997 से पहले मातृभाषा-भाषियों की संख्या के लिहाज से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिंदी को तीसरा स्थान दिया जाता था लेकिन सन् 1997 के भारत की जनांकिकी (सेंसस ऑफ़ इंडिया) के भाषा-जनांकिकी खंड के प्रकाशन और यूनेस्को की भाषा-प्रश्नावली (सन् 1998) के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब यह तथ्य विश्वस्तर पर स्वीकृत और प्रमाणित है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिंदी का दूसरा स्थान है।

हिंदी अपनी वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेज़ी के साथ आगे बढ़ रही है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हिंदी दुनिया के कई देशों में सूचना, संवाद और व्यापार की एक मजबूत ताक़त के रूप में पहचानी जा रही है। अनेक देशों में इस भाषा को लेकर भाषाई और सांस्कृतिक कारणों से गहरी रूचि है। इस कारण, हिंदी भाषा की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का निरंतर विस्तार हो रहा है। इसको अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक नई पहचान मिल रही है। 

पिछले कुछ सालों में भारत सरकार की अध्येतावृत्ति पर और स्वयं के आर्थिक साधनों से हिंदी सीखने के लिए केद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य उच्च शिक्षण संस्थाओं (जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय का नाम प्रमुख है) में आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। निश्चित रूप से इसके पीछे उनके अपने सुनिश्चित व्यापारिक प्रयोजन और मजबूत आर्थिक-पारिस्थितिकी है लेकिन यह प्रक्रिया हिंदी सीखने के पक्ष में एक प्रमुख प्रयोजन भी है।  


हिंदी शिक्षण के लिए संस्थान के प्राध्यापकों की विदेश-प्रतिनियुक्तियाँ 


अंतरराष्ट्रीय फलक पर हिंदी को निरंतर समृद्ध बनाने की दिशा में देश-विदेश के अनेक विद्वान हिंदी शिक्षकों, भाषाविदों ने निरंतर कार्य किया है और आज भी कर रहे हैं। इन सबके प्रयासों से ही हिंदी के शैक्षणिक विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। पिछले लगभग 40 वर्षों में विदेशों में प्रतिनियुक्ति के जरिए हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ देने वाले  संस्थान के प्राध्यापकों का विवरण निम्नवत है-

 

क्र. सं.

प्राध्यापक का नाम

देश/विद्यालय

अवधि

1.

डॉ. (कु.) पुष्पा श्रीवास्तव

फ्लोरेडा स्टेट विश्वविद्यालय

1.8.75 से 18.12.1977 तक

2.

डॉ. मदन लाल वर्मा

काबुल

15.4.1976 से 12.1.1977 तक

3.

डॉ. धर्मपाल गांधी

यार्क विश्वविद्यालय

19.9.1978 से 20.10.1980 तक

4.

डॉ. एस. के रोहरा

गयाना

27.9.1978 से 26.9.1982 तक

5.

डॉ. संयुक्ता कौशल

पश्चिम जर्मनी

16.1.1979 से 6.5.1983 तक

6.

डॉ. ठाकुर दास

क्यूबा

26.7.1979 से 27.2.1983 तक

7.

डॉ. शंभुनाथ पांडेय

मॉरीशस

17.8.1979 से 19.10.1981 तक

8.

डॉ. उमाशंकर शर्मा सतीश

सूरीनाम

1.12.1981 से 29.11.1983 तक

9.

डॉ. शेरबहादुर झा

गयाना

1.1.1982 से 11.6.1985 तक

10.

डॉ. श्रीशचंद्र जैसवाल

यार्क विश्वविद्यालय

9.10.1983 से 15.7.1984 तक

11.

डॉ. रविप्रकाश श्रीवास्तव

यार्क विश्वविद्यालय

16.1.1985 से 14.4.1985 तक

12.

डॉ. (श्रीमती) चंद्रप्रभा

यू.एस.ए

8.7.1985 से 4.7.1988 तक

13.

डॉ. रविप्रकाश गुप्त

पोलैंड

15.9.1987 से 14.9.1989 तक

14.

डॉ. श्रीमती मंजू गुप्ता

पोलैंड

15.9.1987 से 13.9.1990 तक

15.

डॉ. ललित मोहन बहुगुणा

यार्क विश्विद्यालय

20.10.1987 से 25.9.1988 तक

16.

डॉ. अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

इटली

18.12.1987 से 1.11.1992 तक

17.

डॉ. सूरजभान सिंह

रोमानिया

1.1.1988 से 10.1.1993 तक

18.

डॉ. धर्मपाल गांधी

कोरिया

5.4.1988 से 15.2.1990 तक

19.

डॉ. श्रीशंचन्द्र जैसवाल

मास्को

1.8.1989 से 16.9.1992 तक

20.

डॉ. मोहन लाल सर

हैलसिंकी (फिनलैंड)

18.9.1990 से 31.7.1993 तक

21.

डॉ. चतुर्भुज सहाय

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन

20.8.1991 से 21.6.1992 तक

22.

डॉ. एम. जी चतुर्वेदी

ट्रिनीडाड

20.10.1991 से 23.10.1992 तक

23.

डॉ. गीता शर्मा

मॉस्को

30.7.1994 से 17.12.1997 तक

24.

डॉ. देवेन्द्र शुक्ल

बुल्गारिया (सोफिया)

27.9.1994 से 28.10.1996 तक

25.

डॉ.(श्रीमती) अनीता गांगुली

हैलसिंकी (फिनलैंड)

24.9.1994 से 31.7.1997 तक

26.

डॉ. धर्मपाल गांधी

जापान

1.5.1996 से 5.5.1998 तक

27.

डॉ. एम. ज्ञानम

कोरिया

6.9.1997 से 31.8.1999 तक

28.

डॉ. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव

जापान

4.4.1998 से 3.4.2000 तक

29.

डॉ. (श्रीती) सी. ई. जीनी

चीन

4.9.1998 से 4.10.2000 तक

30.

डॉ. अरुण चतुर्वेदी

जापान

23.3.2000 से 31.3.2002 तक

31.

डॉ. रवि प्रकाश गुप्त

हंगरी

6.10.2000 से 5.10.2003 तक

32.

डॉ. के.जी. कपूर

अफगानिस्तान

24.10.2007 से 31.10.2009 तक

33.

डॉ. सुशीला थॉमस

अंकारा वि.वि. टर्की

10.11.2008 से 30.9.2011 तक

34.

डॉ. प्रमोद शर्मा

एल्ते वि.वि. बुडापोस्ट (हंगरी)

17.7.2008 से 20.1.2011 तक

35.

डॉ. देवेन्द्र शुक्ल

पैकिंग वि.वि. बीजिंग (चीन)

6.2.2009 से फरवरी (दो वर्ष के लिए)

36.

डॉ. गीता शर्मा (दो बार)

ओसाका वि.वि. जापान

1.10.2002 से 31.3.2005 तक

37.

 प्रो. श्रीचंद्र जैसवाल

बल्लाडोलिड वि.वि. स्पेन

6.10.2010 से दो बर्ष तक

 


विदेशी शिक्षण संस्थानों के साथ शैक्षणिक सहयोग एवं समन्वय


विदेशी भाषा हिंदी शिक्षण, विदेशों में हिंदी शिक्षण और  विशेषतः बहुसांस्कृतिक परिवेश में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में संस्थान की विशेषज्ञता और अनुभव को देखते हुए संस्थान को दुनिया भर के देशों का विश्वास हासिल हुआ है।  


हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के साथ संभव हुए वैश्विक संवाद के जरिए इस भाषा को नई चेतना, नई ऊर्जा और आधुनिकताबोध हासिल हुआ है। ज्ञान-विज्ञान की नई अवधारणाओं के साथ इसमें अनेक नए शब्दों की सर्जना हुई है, हो रही है। लेकिन इस दिशा में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। 

हिंदी की व्यापक स्वीकृति और विकास के लिए इसमें समावेशिकता और सरलता के मुद्दों पर दूरदृष्टि और संवेदनशीलता से काम करने की ज़रूरत है। निस्संदेह हिंदी के अंतरराष्ट्रीय शिक्षण-अनुसंधान मार्ग में अनेक चुनौतियाँ हैं । फिर भी हिंदी संभावनाओं का एक ऐसा द्वार है जो विकास और सर्जनात्मकता के लिए सदैव खुला रहता है।

पूर्वोत्तर सामग्री निर्माण विभाग

परिचय एवं उद्देश्य -
पूर्वोत्तर सामग्री निर्माण विभाग पूर्वोत्तर राज्यों के लिए स्थापित एक विभाग है। जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के पूर्व में स्थापित अहिंदी राज्यों के लिए हिंदी पाठ्य पुस्तकें, अध्येता कोश, लोक साहित्य एवं अन्य सामग्री तैयार की जाती है। जिनको समय-समय पर पूर्वोत्तर राज्यों की माँग अनुसार संबंधित राज्य के विषय विशेषज्ञ एवं केंद्रीय संस्थान आगरा के विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार की जाती है ताकि पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी का प्रचार एंव प्रसार अधिक से अधिक हो सकें।


कार्यकलाप -
पूर्वोत्तर राज्यों हेतु शिक्षण सामग्री जैसे: अध्येता कोश, लोक साहित्य, पाठ्य पुस्तकें, अध्यापक मार्गदर्शिकाएं, अभ्यास मालाएं हिंदी पाठ्य पुस्तकें एवं अन्य साम्रगी का निर्माण कार्य किया जाता है।


 

विभागीय सदस्य -
विभागाध्यक्ष

डॉ. सतवीर सिंह


प्रशासनिक सदस्य

मनीष कुमार शाक्य



विभागीय गतिविधियाँ -
शिक्षण सामग्री निर्माण हेतु पिछले 05 वर्षों में आयोजित कार्यशालाएँ -

 

2015-16 - 15 कार्यशालाएँ
2016-17 - 52 कार्यशालाएँ
2017-18 - 67 कार्यशालाएँ
2018-19 - 56 कार्यशालाएँ
2019-20 - 28 कार्यशालाएँ (माह जुलाई, 2019 तक)

विभाग द्वारा निर्मित शैक्षणिक सामग्री (अध्येता कोश, लोक साहित्य ग्रंथ, पाठ्य पुस्तकें आदि) -
अध्येता कोश :
निर्मित/प्रकाशित :
1. हिंदी-कॉकबरक(त्रिपुरा)
2. हिंदी-मिज़ो (मिजोरम)
3. हिंदी-निशी (अरुणाचल प्रदेश)
4. हिंदी-खासी(मेघालय)
5. हिंदी-गारो(मेघालय)
6. हिंदी-मणिपुरी(मणिपुर)
7. हिंदी-नेपाली(सिक्किम)
8. हिंदी-ओड़िआ(ओड़िशा)
9. हिंदी-असमिया(असम)
10. हिंदी-बल्ती(जम्मू-कश्मीर)
11. हिंदी-भूटिया(सिक्किम)
12. हिंदी-लेप्चा(सिक्किम)
13. हिंदी-लिम्बू(सिक्किम)
14. हिंदी-जेलियांग(नागालैंड)
15. हिंदी-डोगरी(जम्मू-कश्मीर)
16. हिंदी-भीली(मध्य प्रदेश)
17. हिंदी-राई(सिक्किम)
18. हिंदी-सौराष्ट्री(गुजरात)
19. हिंदी-सुरती(गुजरात)
20. हिंदी-पट्टणी(गुजरात)
21. हिंदी-चरोतरी(गुजरात)
22. हिंदी-नोक्ते(अरुणाचल प्रदेश)
23. हिंदी-आदी(अरुणाचल प्रदेश)

प्रकाशनाधीन:
1. हिंदी-मोनपा(अरुणाचल प्रदेश)
3. हिंदी-सिंग्फो(अरुणाचल प्रदेश)
4. हिंदी-तेलुगु(हैदराबाद)
5. हिंदी-सिंधी
6. हिंदी-कन्नड़(कर्नाटक)
7. हिंदी-कोंकणी(गोवा)
8. हिंदी-मलयालम(केरल)
9. हिंदी-सेमा(नागालैंड)

निर्माणाधीन अध्येता कोश

1. हिंदी-गालो(अरुणाचल प्रदेश)
2. हिंदी-जयंतिया(मेघालय)
3. हिंदी-राभा(असम)
4. हिंदी-जमातिया(त्रिपुरा)
5. हिंदी-मिशमी(अरुणाचल प्रदेश)
6. हिंदी-तागिन(अरुणाचल प्रदेश)
7. हिंदी-बोरो/बोड़ो(असम)
8. हिंदी-शीना(जम्मू-कश्मीर)
9. हिंदी-गढ़वाली(उत्तराखंड)
10. हिंदी-तमिल(तमिलनाडु)
11. हिंदी-कुमाऊँनी(उत्तराखण्ड)
12. हिंदी-मलयालम(केरल)
13. हिंदी-बांग्ला (पश्चिम बंगाल)
14. हिंदी-मराठी (महाराष्ट्र)
15. हिंदी-पंजाबी (पंजाब)
16. हिंदी-गुजराती(गुजरात)
17. हिंदी-संथाली(झारखण्ड)

पाठय पुस्तकें:
सिक्किम राज्य की कक्षा 1 से 8 तक की हिंदी पाठ्य पुस्तकों का निर्माण।
अध्यापक मार्गदर्शिकाएँ: सिक्किम की कक्षा 1, 2 एवं 3 तक अध्यापक मार्गदर्शिकाओं का निर्माण।
अभ्यास मालाएँ: सिक्किम की कक्षा 1, 2 एवं 3 तक अभ्यास-माला पुस्तकों का निर्माण।


लोक साहित्य:
पूर्वाेत्तर राज्य हेतु 57 लोक साहित्यों का निर्माण किया जाना है।
प्रकाशित लोक साहित्य:
1. मणिपुरी (मणिपुर)
2. मिज़ो (मिजोरम)
3. बोरो (असम)
4. कॉकबराक (त्रिपुरा)


निर्माणाधीन लोक साहित्य
1. आदी (अरुणाचल प्रदेश)
2. निशी (अरुणाचल प्रदेश)
3. नोक्ते (अरुणाचल प्रदेश)
4. मोनपा (अरुणाचल प्रदेश)
5. गुजराती (गुजरात)


 

 

 

सूचना एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग

परिचय एवं उद्देश्य -
केंद्रीय हिंदी संस्थान का सूचना एवं भाषा-प्रौद्योगिकी विभाग हिंदी के शिक्षण-प्रशिक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार को आधुनिक सूचना-प्रौद्योगिकी माध्यमों एवं नवीनतम संचार-युक्तियों व प्रविधियों से सुसज्जित एवं अद्यतन रखने वाला एक महत्वपूर्ण विभाग है जिसकी परिकल्पना एवं स्थापना संस्थान के विकास के तीसरे चरण (1980 के बाद) में हुई।


उद्देश्य -

प्रथम, द्वितीय, विदेशी एवं प्रयोजनमूलक अध्ययन-अध्यापन की दृष्टि से हिंदी पाठ्यक्रमों/ पाठ्यचर्याओं का संसाधन, पुनर्गठन एवं आधुनिकीकरण।
हिंदी के बहु-आयामी विकास में नवीनतम सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) उपकरणों और सुविधाओं का अनुप्रयोग एवं तदनुसार,
हिंदी की शिक्षण-प्रशिक्षणपरक सहायक (दृश्य-श्रव्य, इंटरेक्टिव-मल्टीमीडिया) सामग्री का निर्माण, विकास एवं मानकीकरण।


कार्यकलाप -

इन उद्देश्यों की व्यापकता और विशिष्टता को देखते हुए संस्थान के आगरा, मुख्यालय में विभाग द्वारा संपन्न किए जाने वाले कार्यकलापों को निम्नवत प्रस्तुत किया जा सकता है

आईसीटी साधित शिक्षण-प्रशिक्षण कार्य -
1. अभिनव मल्टीमीडिया शिक्षण कक्ष
2. डिज़िटल भाषा प्रयोगशाला
3. कंप्यूटर प्रयोगशाला
ऑडियो स्टूडियो एवं डिज़िटल ऑडियो-विज़ुअल एडिटिंग
परीक्षा, लेखा, प्रशासन विभाग के सूचना-तकनीकी साधित कार्यों में सहयोग
सॉफ़्टवेयर संबंधी परामर्श एवं कार्यक्रम विकास
कंप्टयूर हार्डवेयर रखरखाव एवं सुधार
शैक्षणिक परियोजनाओं से संबंधित कार्य


विभागीय सदस्य

विभागाध्यक्ष -
श्री अनुपम श्रीवास्तव, असि. प्रोफ़ेसर, विभागाध्यक्ष
शैक्षिक सदस्य-
श्री केशरी नंदन, असि. प्रोफ़ेसर: अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (प्रभारी, हिंदी कॉर्पोरा परियोजना)

प्रशासनिक / तकनीकी सदस्य

श्रीमती गुंजन जैन, कंप्यूटर प्रोग्रामर
श्री दिवाकरनाथ त्रिपाठी, ध्वनि अंकज्ञ
श्री अनिल कुमार पांडेय, भाषा प्रयोगशाला तकनीकज्ञ

सुश्री प्रिया पाण्डेय (अनुबंधित लिपिक)


कॉर्पोरा परियोजना अनुभाग

श्री केशरी नंदन, असि. प्रोफ़ेसर (प्रभारी, हिंदी कॉर्पोरा परियोजना)
श्री आकाश भदौरिया, परियोजना सहायक (अनुबंध पर)
श्री अजय कर्दम, डाटा ऑपरेटर (अनुबंध पर)


विभागीय परियोजनाएँ

हिंदी कॉर्पोरा परियोजना
भाषा-साहित्य सी.डी. निर्माण परियोजना


 

सांध्यकालीन पाठ्यक्रम विभाग

परिचय एवं उद्देश्य -
सांध्यकालीन विभाग द्वारा हिंदी के प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों का संचालन किया जाता है। इन पाठ्यक्रमों की प्रकृति अंशकालिक (Part Time) एवं लघु-अवधीय (Short Term) होने के कारण इनका लाभ वे सभी हिंदी एवं हिंदीतरभाषी विद्यार्थी ले सकते हैं, जो हिंदी को अपने कैरियर के साथ जोड़कर भविष्य में कार्य करना चाहते हैं।



कार्यकलाप -
विभाग द्वारा हिंदी के निम्नलिखित प्रयोजनमूलक शैक्षणिक पाठ्यक्रमों का संचालन किया जाता है -
1. जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
2. अनुवाद सिद्धांत एवं व्यवहार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
3. अनुप्रयुक्त हिंदी भाषा विज्ञान में परास्नातकोत्तर डिप्लोमा



विभागीय सदस्य -
विभागाध्यक्ष
श्री केशरी नंदन, असि. प्रोफ़ेसर
शैक्षिक सदस्य
श्री ब्रज खण्डेवाल (अनुबंधित अतिथि प्रवक्ता : जनसंचार एवं पत्रकारिता)
डॉ. राजशंकर शर्मा (अनुबंधित अतिथि प्रवक्ता : जनसंचार एवं पत्रकारिता)

 

प्रशासनिक सदस्य -
श्री अजय कर्दम, डाटा इनपुटर (अनुबंध)
श्री मनोज देवरानी, केयर टेकर


 

 

नवीकरण एवं भाषा प्रसार विभाग

परिचय एवं उद्देश्य -
केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना के मौलिक लक्ष्यों की पूर्ति एवं अनुपालन की दृष्टि से नवीकरण एवं भाषा प्रसार विभाग के अंतर्गत संस्थान द्वारा हिंदीतर भाषी राज्यों के हिंदी अध्यापकों को द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी भाषा का शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी उद्देश्य से विभाग में भारत के हिंदीतर भाषी राज्यों में सेवारत हिंदी शिक्षकों के लिए लघु-अवधीय नवीकरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन नवीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षकों को भाषा-शिक्षण की नवीन प्रविधियों से परिचित कराया जाता है तथा उन्हें मानक हिंदी के प्रयोग के प्रति सतत जागरुक रखने का प्रयास किया जाता है। संस्थान हिंदी शिक्षकों के सतत प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत मुख्यालय, आगरा एवं क्षेत्रीय केंद्रों पर विभिन्न प्रकार के नवीकरण कार्यक्रम संचालन किया जाता है।
(क) हिंदी के प्रयोजनमूलक भाषा भेदों का सर्वेक्षण एवं अनुसंधान।
(ख) नवीकरण, उच्च नवीकरण, संवर्धनात्मक, कौशलपरक एवं लघु-अवधीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का संचालन तथा भाषा संचेतना शिविरों एवं प्रयोजनमूलक हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का आयोजन।
(ग) उक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंदी भाषा एवं साहित्य के उच्चतर अध्ययन की दृष्टि से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, हिंदी भाषा एवं साहित्य के विविध पक्षों पर संगोष्ठी, कार्यशाला एवं प्रसार व्याख्यान आदि कार्यक्रमों का आयोजन।


विभागीय सदस्य

विभागाध्यक्ष -
डॉ. सतवीर सिंह, विभागाध्यक्ष
शैक्षिक सदस्य -
डॉ.रमेश चंद्र, एसो. प्रोफ़ेसर
प्रशासनिक सदस्य -
श्री गोरन सिंह, शैक्षिक सहायक
श्री राजकुमार, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी


संचालित पाठ्यक्रम
मुख्यालय आगरा में संचालित नवीकरण पाठ्यक्रमों का विवरण निम्न प्रकार है

उच्च नवीकरण पाठ्यक्रम (अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान)

इस प्रकार के पाठ्यक्रमों के अंतर्गत विश्वविद्यालयी स्तर पर हिंदी भाषा की अध्ययन-अध्यापन संबंधी समस्याओं पर विचार किया जाता है और संदर्भित पाठ्यक्रमों को आवश्यकतानुसार अधिक भाषानिष्ठ बनाने के लिए भाषावैज्ञानिक, शैलीवैज्ञानिक, कोशवैज्ञानिक आदि अनुप्रयोगपरक संदृष्टियों को विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

हिंदी भाषा संचेतना विकास शिविर

यह पाठ्यक्रम उन हिंदी शिक्षकों एवं प्रशिक्षणार्थियों के लिए आयोजित किए जाते हैं जो हिंदी पढ़ते तो हैं किंतु इसकी प्रायोगिक विविधता एवं व्यापक सामासिक समरसतापूर्ण भूमिका से अनभिज्ञ रह जाते हैं। हिंदी भाषा संचेतना विकास शिविरों के माध्यम से ऐसे प्रशिक्षणार्थियों को हिंदी की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय एवं राजभाषायी भूमिकाओं से परिचित कराया जाता है और उनमें इसके महत्व एवं प्रयोग के प्रति संचेतना विकसित की जाती है।

नवीकरण कार्यक्रम

संस्थान द्वारा सिक्किम राज्य के अध्यापनरत (माध्यमिक स्तरीय) अध्यापकों के लिए मुख्यालय, आगरा में नवीकरण पाठ्यक्रम का आयोजन किया जाता है।

संवर्धनात्मक पाठ्यक्रम

संस्थान द्वारा संचालित शैक्षिक गतिविधियों से संबद्ध संस्थानों एवं प्रशिक्षण महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम एवं परीक्षा संबंधी एकरूपता तो होती है, फिर भी शिक्षण संबंधी एकरूपता बनाए रखने का दायित्व भी मुख्यालय द्वारा आगरा में निर्वहन किया जाता है। इसके लिए प्रशिक्षणार्थियों को हिंदी के स्वाभाविक परिवेश से परिचित कराने के लिए नवीकरण एवं भाषा प्रसार विभाग द्वारा संवर्धनात्मक पाठ्यक्रम आयोजित से संबंधित विषयों पर व्याख्यान कराये जाते हैं तथा प्रशिक्षणार्थियों की अध्ययन संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाता है।