मंगलवार, अक्टू 22

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भारतीय प्रकाशन की समस्याओं पर विकास संगोष्ठी

केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली केन्द्र द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के लेक्चर हाल में 'भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ' विषय पर 9 अगस्त 06 को एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई। प्रथम सत्र का आधार-विषय था : 'हिंदी प्रकाशन उद्योगः समस्याएँ और संस्कृति'। द्वितीय सत्र में 'पुस्तकें: पाठकों की खोज में', विषय पर चर्चा हुई। इस संगोष्ठी में वरिष्ठ लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

उद्घाटन सत्र की विषय-प्रस्तुति संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ ने की। संगोष्ठी की मूल संकल्पना को रेखांकित करते हुए प्रो.शंभुनाथ ने कहा कि जब तक लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों का समन्वित त्रिभुज नहीं निर्मित होता और उनमें आपसी संवाद नहीं बढ़ता, तब तक देश में पुस्तक-चेतना की क्रान्ति नहीं आ सकती।

संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि पुस्तकों ने समाज में लोकतांत्रिक संस्कारों को जगाया है। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान, कोलकाता के निदेशक श्री के. के. बनर्जी ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज बन रही है और हम इंटरनेट के दरवाजे पर खड़े हैं। अब तो डिजिटल बुक्स का ज़माना आ गया है। ऐसे परिवेश में पुस्तक-प्रकाशन को उद्योग का दर्जा देने और राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने की बेहद जरूरत है।

उद्घाटन सत्र में प्रतिष्ठत प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाउस के वयोवृद्ध संस्थापक श्री कन्हैयालाल मलिक को संस्थान के उपाध्यक्ष श्री रामशरण जोशी ने सम्मानित किया।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र (भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ) की अध्यक्षता प्रो. शंभुनाथ ने की। वरिष्ठ प्रकाशक श्री अरुण माहेश्वरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में प्रकाशन उद्योग के लिए परिस्थितियाँ पाश्चात्य जगत की भाँति सुविधाजनक और अनुकूल नहीं हैं फिर भी हमें निराश नहीं होना चाहिए।

संगोष्ठी के द्वितीय एवं समापन सत्र (पुस्तकें- पाठकों की खोज में) की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं विचारक प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी ने की। संगोष्ठी का संचालन संस्थान के प्रकाशन-प्रबंधक ङॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा ने किया।