सोमवार, अग 26

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अखिल भारतीय कविता कार्यशाला का आयोजन

"कविता में अर्थ होता नहीं है, कवि द्वारा दिया जाता है। जिस तरह एक पुरानी लोक कथा में राक्षस के प्राण तोते में बसते थे, उसी तरह कविता का अर्थ ढँढ़ना भी दुरूह पहेली है।" ये विचार हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति डा. नामवर सिंह, ने 1-2 सितम्बर, 06 को उदयपुर में आयोजित अखिल भारतीय कविता कार्यशाला के उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। कार्यशाला का आयोजन मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तथा शब्दम् शिकोहाबाद के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया था।

समारोह के विशिष्ट अतिथि उ.प्र. हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष श्री सोम ठाकुर ने कहा कि नए युग की नई संवेदनशीलता कविता के लिए नय़ा मुहावरा गढ़ती है। इस अवसर पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के कुलसचिव डा. चंद्रकान्त त्रिपाठी ने कहा कि संस्थान का प्रयास है कि कविताओं की संगीतात्मक प्रस्तुतियों को बढ़ावा दिया जा सके।

कार्यशाला के प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि विख्यात हिंदी कवि केदारनाथ सिंह तथा विशिष्ट अतिथि कवि वीरेन डंगबाल थे। इस सत्र में विनय सौरभ (झारखण्ड), शिव कुमार (जयपुर), राजीव सभरबाल (भोपाल), शशि मिश्रा (आगरा), माया त्रिपाठी (आगरा), पवन करण (ग्वालियर) आदि ने कविता पाठ किया।

कार्यशाला के दूसरे दिन प्रथम सत्र में गोपाल सहर (गुजरात), सुभाष सिगाठिया (श्रीगंगा नगर), अम्बिका दत्त (कोटा), आशुतोष कुमार (अलीगढ़) तथा द्वितीय सत्र में आशीष त्रिपाठी (बाराणसी), प्रभात (जयपुर), गिरिराज किराडू (जोधपुर) आदि ने कविताओं का पाठ किया।

दो दिन तक चले इस आयोजन के समापन समारोह में प्रो. केदारनाथ सिंह ने समापन व्याख्यान देते हुए कहा कि कार्यशाला मूलतः समाज विज्ञान से आया हुआ शब्द है। लेकिन कविता में कार्यशाला के आयाम बदल जाते हैं। सामूहिक साहचर्य से कविगण कविता-कौशल और काव्य-संवेदन के संबंधों को गहराई से समझ पाते हैं।

कार्यशाला के अंत में सभागार के समीप उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा लगाई गई पुस्तक प्रदर्शनी का विद्यार्थियों तथा पाठक समुदाय ने लाभ प्राप्त किया।