सोमवार, जुल 16

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 दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : दिनांक 04 एवं 05 फरवरी, 2018 (निमंत्रण पत्र-सह-कार्यक्रम विवरणिका) (फोटो गैलरी)


 

प्रथम/ परिचय सत्र -

वोट बैंक की राजनीति ने किया राष्ट्रीयता का क्षरण : डॉ. जय सिंह ‘नीरद’

"एक विचित्र समय में हम और आप खड़े हैं। आज व्यक्ति अपने लिए जी रहा है। हम आज अपने मोहल्ले, समाज व प्रांत के नहीं हैं, राष्ट्र की बात तो दूर की है। स्वतंत्रता से पूर्व हम आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए एक थे। आज़ादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रीयता के क्षण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की...." - ये उद्गार के.एम.आई. के पूर्व निदेशक डॉ. जय सिंह ‘नीरद’ ने रविवार को केंद्रीय हिंदी संस्थान के अटल बिहारी बाजपेयी अंतरराष्ट्रीय सभागार में केंद्रीय हिंदी संस्थान व संस्कार भारती द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन, पहले सत्र में बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किए। विषय था – ‘भारतीय साहित्य में राष्ट्रीयता’। डॉ. नीरद ने कहा कि हमारे देश की धमनियों में राष्ट्रीयता विद्यमान है। आज विकास का दौर है। राष्ट्रीयता व विकास का सह-अस्तित्व आज समय की आवश्यकता है। जरूरी है कि कवि-साहित्यकार भटके देश को रास्ता दिखाये।


जी.एल.ए. विश्वविद्यालय, मथुरा के कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय साहित्य कभी संकीर्ण नहीं रहा। संपूर्ण मानवता के हित की बात हमने की है। हम जोड़ने वाले हैं, तोड़ने वाले नहीं। सत्र संयोजक व संचालक डॉ. अमी आधार निडर ने कहा कि भारत कोई भूखण्ड मात्र नहीं, यह एक विचार है, संस्कार है, सभ्यता है, संस्कृति और गौरव है।


संस्कार भारती व साहित्य की संकल्पना’ विषय पर द्वितीय सत्र में संस्कार भारती के अखिल भारतीय सह-महामंत्री रवीन्द्र भारती ने कहा कि दिनकर के बाद कम ही ऐसे राष्ट्रकवि दिखते हैं, जहाँ राष्ट्रीय चेतना और आह्वान दिखता हो। आज की जरूरत देखते हुए समाज के प्रबोधन के लिए साहित्यकार को भूमिका निभानी चाहिए। इस सत्र में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए पूर्व कुलपति डॉ. गिरीश चंद्र सक्सेना ने कहा कि इस देश में साहित्य सृजन सदैव राष्ट्रीयता से ओतप्रोत रहा है। पूरा विश्व इससे प्रभावित रहा है। आज जरूरी है कि साहित्य के क्षेत्र में बने गिरोह को खत्म कर संस्कार भारतीय राष्ट्रीयता का भाव जाग्रत करे। इस सत्र का संयोजन-संचालन देवेंद्र देव ने किया। संस्कार भारती के केंद्रीय संगठन मंत्री गणेश पंत भी मंचस्थ रहे।
दोनों सत्रों में देश भर से आए 150 से अधिक साहित्यकार व शोधार्थी मौजूद रहे। संगीतज्ञ गजेंद्र सिंह चौहान के निर्देशन में सरस्वती वंदना व ध्येय गीत प्रस्तुत किया गया। शोध छात्रा डॉ. दीप्ती गुप्ता (इंदौर), रंजीत आर.एस. (तिरुवनंतपुरम्), यशपाल निर्मल (जम्मू) ने शोध आलेख पढ़े। केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक, प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय, संस्कार भारतीय के अखिल भारतीय साहित्य संयोजक, राज बहादुर सिंह ‘राज’, सह-संयोजक अजय अवस्थी, सुभाष अग्रवाल ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रो. बीना शर्मा, पद्मश्री योगेंद्र बाबा, पूर्व कुलसचिव डॉ. राम अवतार शर्मा, बांकेलाल गौण, डॉ. मधु भारद्वाज, डॉ. शैलबाला, संजीव वशिष्ट, ताहिर सिद्दकी, राकेश निर्मल, पदम गौतम प्रमुख रूप से रहे।

 


 उद्घाटन सत्र :

साहित्य के एक शब्द-एक पंक्ति से घटती है क्रांति : राज्यपाल राम नाइक
केंद्रीय हिंदी संस्थान में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य संगोष्ठी का राज्यपाल ने किया शुभारंभ
आगरा। मानवीय जीवन में साहित्य का विशेष महत्व है। जीवन मूल्यों की रक्षा में इसकी प्रमुख भूमिका रही है। वो चाहे ‘दिल्ली-चलो’ का नारा हो या ‘स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ की घोषणा, साहित्य के एक शब्द-एक पंक्ति से क्रांति घट जाती है। स्वाधीनता संग्राम में भी साहित्यकारों की विशिष्ट भूमिका रही। साहित्य हमें सदैव जीवन पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
ये उद्गार उत्तर प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री राम नाइक ने रविवार शाम केंद्रीय हिंदी संस्थान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य संगोष्ठी के प्रथम दिन बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए। उन्होंने अपने पुस्तक ‘चरैवेति चरैवेति’ पर चर्चा करते हुए देश भर से पधारे साहित्यकारों को चलते रहने का संदेश दिया। कहा कि सूर्य की तरह जगत में वंदनीय होना है तो अपने सृजन से सूर्य की तरह जगत को प्रकाशित करो।
इससे पूर्व, उन्होंने माँ शारदे की प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर व माल्यार्पण करके संगोष्ठी का औपचारिक शुभारंभ किया। केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित व संपादित हिंदी-नेपाली अध्येता कोश का लोकार्पण किया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बल्देव भाई शर्मा ने उन्हें उनकी पुस्तक का संस्कृत में प्रकाशित अनुवाद भेंट किया।
इस मौके पर डॉ. बी.आर. आंबेदकर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव व संगोष्ठी के स्वागताध्यक्ष डॉ. राम अवतार शर्मा ने स्वागत उद्बोधन देते हुए आशा जताई कि इस मंथन से निकला नवनीत देश के वैचारिक विकास में महती योगदान देगा। संस्कार भारती के अखिल भारतीय सह-महामंत्री रवीन्द्र भारती ने आयोजन के प्रयोजन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मातृभूमि के प्रति निष्ठा भाव व समन्वयवादी दृष्टि प्रदान करने के साथ भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करना संस्कार भारती का हेतु है। जागृत जनता का धर्म है राष्ट्रीय बोध, इसे सिर्फ साहित्यकार ही जगा सकता है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने कहा कि भारत के हर काल-हर क्षेत्र-हर भाषा में राष्ट्र अर्चन का साहित्य लिखा गया। राष्ट्र को एक होने का संदेश दिया। अमीर खुसरो से लेकर आगरा के नजीर अकबरावादी तक उनके मुस्लिम व सूफी कवियों ने भी अपने सृजन से राष्ट्र की अर्चना की। राजनीतिक परिस्थितियों की अपेक्षा सांस्कृतिक परिस्थितियों का साम्य भारतीय साहित्य में अधिक परिलक्षित होता है। लगभग 1000 वर्ष पूर्व पूरे भारत वर्ष में अनेक सांस्कृतिक आंदोलन ऐसे हुए जिनका प्रभाव राष्ट्रवादी था। उन्होंने बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की काव्य पंक्ति – ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ’ से अपना वक्तव्य समाप्त किया।
संगोष्ठी के मूल विषय ‘साहित्य सृजन से राष्ट्र अर्चन’ के उद्घाटन सत्र मे आभार व्यक्त करते हुए केंद्रीय हिंदी शिक्षण मण्डल के उपाध्यक्ष प्रो. कमल किशोर गोयनका ने कहा की राष्ट्र की सत्ता के लिए साहित्य अनिवार्य है। साहित्यकार का धर्म है कि वो राष्ट्र की आत्मा की रक्षा करे। उन्होंने राज्यपाल से केंद्रीय हिंदी संस्थान को अंतरराष्ट्रीय ख्याति का हिंदी शिक्षण शोध केंद्र बनाए जाने में सहयोग करने की अपील की। अंत में राष्ट्रगान किया गया। इस सत्र का संचालन राज बहादुर सिंह ने किया।


कला दर्शन ने किया मंत्रमुग्ध
आगरा। संगोष्ठी के पहले दिन शाम को संस्कार भारती की ओर से संगीतज्ञ गजेंद्र चौहान व प्रो. नीलू शर्मा तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान की ओर से मीता गांगुली और दीपक प्रभाकर के निर्देशन में तथा कुलसचिव प्रो. बीना शर्मा के संयोजन एवं प्रीति गुप्ता और सपना गुप्ता के सहोयग से कला दर्शन कार्यक्रम किया गया। संस्कार भारती के कलाकारों व केंद्रीय हिंदी संस्थान के हिंदीतर भाषी व विदेशी छात्र-छात्राओं ने ताल-वाद्य-संगम व भाव नृत्य की अनूठी प्रस्तुतियों से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।



ये भी रहे संगोष्ठी में शामिल
पद्मश्री योगेंद्र बाबा, पूर्व सांसद प्रभुदयाल कठेरिया, विधायक जगन प्रसाद गर्ग, पूर्व स्क्वाड्रन लीडर ए.के. सिंह, कुलपति अरविंद कुमार दीक्षित, बांकेलाल गौण, सुभाष चंद्र अग्रवाल, प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव, राज्यश्री बनर्जी, डॉ. मधु भारद्वाज, सी.ए. नितेश गुप्ता, ताहिर सिद्दिकी, मधु भारद्वाज, शीलेंद्र वशिष्ठ, पदम गौतम, अनुपम श्रीवास्तव, प्रो. मीरा सरीन, प्रो. हरिशंकर, डॉ. दिग्विजय शर्मा, डॉ. आकाश भदौरिया, चंद्रकांत कोठे, केशरी नंदन, डॉ. गंगाधर वानोडे, हरी मोहन सिंह कोठिया, अजय अवस्थी, राकेश निर्मल।


 

 

 द्वितीय दिवस - दिनांक : 05.02.2018


 जगाओ अलख दे नया नित्य नारा ............कलम के सिपाही वतन है तुम्हारा


विविधताओं में प्रेम के धागे ढूँढता है भारतीय साहित्यकार : डॉ. कृष्ण गोपाल
आगरा। प्रवृत्ति से निवृत्ति भारत के राष्ट्र पुरुष की यात्रा है। जो देता है वही देवता है। जो रखता है, वही राक्षस है। विविधताओं में एकत्व का अनुभव भारत का राष्ट्रीय दर्शन है। विविधता में प्रेम के धागे भारतीय साहित्यकार ढूँढता है......ये उद्गार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के डॉ. कृष्ण गोपाल ने सोमवार को केंद्रीय हिंदी संस्थान में केंद्रीय हिंदी संस्थान व संस्कार भारती द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य संगोष्ठी के दूसरे दिन दूसरे सत्र में बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किए। साहित्य सृजन से राष्ट्र अर्चन विषय पर उन्होंने कहा कि भारत की 16 प्रमुख भाषाओं में ‘एकस्क्लूसिव’ के लिए कोई शब्द नहीं। हम ‘इन्क्लूसिव’ हैं। हम दुनिया के हर जीव को अपना मानते हैं।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बल्देव भाई शर्मा ने इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि पूरी दुनिया को विनाश से बचाने वाला केवल भारत का विचार है। विश्व को एक परिवार के रूप में रहने की संकल्पना देने वाले भारतीय साहित्य को पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है। साहित्य को दलित, महिला या प्रगतिशीलता में खंडित मत करो। साहित्य तो सबके लिए है। राष्ट्रिय अस्मिता सर्वोपरि है।


इससे पूर्व, प्रथम सत्र में मैसूर के प्रो. डी.पी. उपाध्याय ने ललित कलाओं के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। कहा कि भारतीय कला मनोविकार नहीं, मनोविकास पर आधारित है। संस्कार भारती के अखिल भारतीय सह-महामंत्री रवीन्द्र भारती ने कहा कि संस्कार भारती से जुड़े लोगों को ललित कला के विभिन्न पक्षों का बोध जरूरी है। अध्यक्षीय उद्बोधन में दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. कुमुद शर्मा ने कहा कि सांस्कृतिक अस्मिता का गला घोंटकर राष्ट्र चिंतन संभव नहीं। कवि-कलाकार ही संस्कृति का एन्टीना होता है। साहित्य समाज का निरा दर्पण नहीं होता, वह नैतिक संवेदन की अंतरदृष्टि का रूपायन भी होता है। आचार्य देवेन्द्र देव ने कहा कि हम नए निर्माण की संस्कृति जगाना चाहते हैं। लखनऊ के विजय त्रिपाठी ने यूँ आह्वान किया – ‘जगाओ अलख दे नया नित्य नारा। कलम के सिपाही वतन है तुम्हारा।’ पंकज बाला शर्मा ने गुरुमुखी और वैदिक साहित्य, डॉ. विद्या जोशी ने मराठी साहित्य, सी.पी. संन्यासी (बिहार), डॉ. चंद्रशेखर सिंह (छत्तीसगढ़) व आगरा के हरीमोहन सिंह कोठिया ने भी विचार रखे।


तृतीय सत्र में ‘कलाओं के संवर्धन में साहित्य की भूमिका’ पर चर्चा की गई। पूर्व कुलपति डॉ. रिपुदमन श्रीवास्तव ने कहा कि साहित्य और कला एक दूसरे के पूरक हैं।
संयोजक अशोक बत्रा (दिल्ली) ने कहा कि भाव से कला पैदा होती है। कला के विकास के लिए भाव का परिशुद्ध होना जरूरी है। साहित्य कला नहीं, विद्या है जो अन्य कलाओं को निर्देश देती है।
पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने प्रोजेक्टर के माध्यम से विचार के कला पक्ष पर प्रकाश डाला। कहा कि पाठक का ध्यान आकृष्ट करने व विषय से पाठक को जोड़ने वाला साहित्य रचें।


समापन सत्र में विदेशी विद्यार्थी एलीना (आर्मेनिया), मोहम्मद फहीम (अफगानिस्तान), तमरी जयशेखर (श्रीलंका) व लक्ष्मण अरविन्द (सूरीनाम) ने अपनी भाषा व संस्कृति को हिंदी में रेखांकित करके वाहवाही लूटी।
राष्ट्रीय कवि गजेंद्र सोलंकी के इस गीत पर सब झूम उठे – ‘जिसके आँचल में पलने को लेता जनम विधाता है। सारे जग में अजब निराली अपनी भारत माता है।’ पद्मश्री बाबा योगेंद्र दा ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि एकमात्र साधक ही अच्छे दिन ला सकता है। अपनी कुशलता व रचना-धर्मिता की शक्ति से लोगों को दिशा दें। केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने सबका आभार व्यक्त करते हुए बताया कि संस्थान के प्रयासों से विश्व भर में हिंदी पढ़ने के प्रति जागरुकता आई है। इस वर्ष 41 देशों के विद्यार्थी केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी पढ़ने आए हैं।
विभिन्न सत्रों का संचालन संस्कार भारती के अखिल भारतीय संयोजक राज बहादुर सिंह ‘राज’, गौतम खेरीवाल (चेन्नई), नन्द किशोर पाण्डेय व अश्वनी कुमार श्रीवास्तव ने किया। प्रो. कमल किशोर गोयनका, बाँके लाल गौण, सुभाष चंद्र अग्रवाल, मनोज पचौरी, ताहिर सिद्दिकी, राकेश गोयल, ओम स्वरूप गर्ग, हरिओम यादव, डॉ. राम अवतार शर्मा, ए.के. सिंह, गणेश पंत, राकेश निर्मल, पदम गौतम, डॉ. जोगेंद्र सिंह मीणा, डॉ. सपना गुप्ता, कुमार ललित विभिन्न भूमिकाओं में रहे।
दूसरे दिन महेश कुमार शर्मा, रायपुर द्वारा संपादित पत्रिका कविता कुंज, आगरा के कवि शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ द्वारा संपादित चर्वणा पत्रिका का भी विमोचन किया गया।

 

 

 

 

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सूचना-पट

वार्षिक परीक्षा परिणाम 2017-18 (नया)

नियमित अध्यापक शिक्षा पाठ्यक्रम सत्र 2018-19 की प्रवेश परीक्षा के परिणाम - (Pg.1) (Pg.2) (Pg.3) (Pg.4) (नया)

संस्थान मुख्यालय आगरा एवं दिल्ली केंद्र द्वारा संचालित सांध्यकालीन पाठ्यक्रम सत्र 2018-19 हेतु प्रवेश सूचना, विवरणिका हिंदी / Prospectus English एवं आवेदन पत्र डाउनलोड करें। संशोधित अंतिम तिथि 11 जुलाई 2018

हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2017 हेतु प्रस्ताव आमंत्रित (विज्ञापन) (नामांकन प्रस्ताव प्रपत्र)

केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली केंद्र पर सुरक्षा, सफाई एवं बिजली व्यवस्था हेतु निविदा/संविदा (आवेदन और नियम तथा शर्तें)

संस्‍थान के नियमित शिक्षण-प्रशिक्षक पाठ्यक्रमों हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा 2018 के लिए चयनित योग्‍य अभ्‍यर्थियों की सूची (नया)

विज्ञापन - संस्थान के 03 हॉस्टल मेसों के लिए अनुभवी पंजीकृत कैटरर्स/ ठेकेदार चाहिए  | नियम एवं शर्तें (नया)

प्रेस विज्ञप्तिः हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2016 के लिए चयनित विद्वानों के नामों की घोषणा

हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकारों पर पुस्तक निर्माण संबंधी कार्यशाला

 

साहित्य अकादमी और केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. नगेंद्र जन्म- 

       शतवार्षिकी समारोहएवं लेखक से भेंट कार्यक्रम
परिचय
  • केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के उच्चतर विभाग द्वारा 1960 ई. में स्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित शिक्षण संस्था है। संस्थान मुख्यतः हिंदी के अखिल भारतीय शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए कार्य-योजनाओं का संचालन करता है।
  • संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है। इसके आठ केंद्र दिल्ली (स्था. 1970), हैदराबाद (स्था. 1976), गुवाहाटी (स्था. 1978), शिलांग (स्था. 1987), मैसूर (स्था. 1988), दीमापुर (स्था. 2003), भुवनेश्‍वर (स्था. 2003) तथा अहमदाबाद (स्था. 2006) में सक्रिय हैं।

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विकास यात्रा

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना सन् 1960 में हुई थी। तब से आज तक लगातार मंडल द्वारा निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के अनुपालन में संस्थान हिंदी के शैक्षणिक विकास, बहुआयामी अनुसंधान और प्रचार-प्रसार के लिए अपनी गतिविधियों को विस्तार देता रहा है। पाँच दशकों से अधिक लंबी इस विकास-यात्रा के उल्लेखनीय पड़ावों की जानकारी इस खंड में बिंदुवार प्रस्तुत की जा रही है।

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विज़न 2021
  • आधुनिकतम संचार माध्यमों और सूचना प्रौद्योगिकी का हिंदी भाषा शिक्षण और दूर शिक्षा के लिए अधिकाधिक प्रयोग
  • यूनिकोड का व्यापक प्रचार और प्रसार
  • एक विशाल पोर्टल और बहुभाषी वेबसाइट
  • पॉप्युलर कल्चर के महत्त्व का रेखांकन, फ़िल्म लोक-नाट्य, कविसम्मेलन और मुशायरे
  • हिंदी की बोलियों का संरक्षण हो तथा देश-विदेश में नए केंद्रों की स्थापना
  • देश-विदेश के हिंदी के प्रख्यात साहित्य शिल्पियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर फ़िल्में बनाई जाएं
  • विश्व भर की संस्थाओं और विश्वविद्यालयों से सकर्मक जुड़ाव
  • मानकीकृत पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन
  • विश्व के महान साहित्यिक कृतियों और ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथों का हिंदी अनुवाद
  • जिन संस्थाओं के पास साधनों का अभाव है, हिंदी के विकास के लिए उनकी मदद

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फ़ोटो गैलरी

संस्थान की विविध गतिविधियों से संबंधित छवियों का विस्तृत संग्रह

नई गतिविधियाँ

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस-2017 

मा.सं.वि. मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक (22.05.2017)

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ओडियो-विजुअल गैलरी

Hindi-Sevi-Samman-2010-11-thumb

हिंदी सेवी सम्मान (वर्ष 2010 एवं 2011)

हिंदी सेवी सम्मान 2008-09

हिंदी सेवी सम्मान (वर्ष 2008 एवं 2009)

स्वर्ण जयंती वीडियो

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्वर्ण जयंती

उपयोगी लिंक

हिंदी शिक्षण, हिंदी भाषा संसाधन और संवर्धन से जुड़ी उपयोगी सूचना एवं जानकारियों से जुड़ी वेबसाइटों और वेब-पोर्टलों के लिंक।

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