रविवार, फरव 17

  •  
  •  

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 19-20 नवंबर, 2016 को भारतीय भाषाएँ एवं हिंदी शिक्षण विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है। इस संगोष्ठी का उद्घाटन दिनांक 19 नवंबर, 2016 को संस्थान मुख्यालय स्थित नज़ीर सभागार में संपन्न हुआ।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में स्वागत वक्तव्य संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि सन 2003 के बाद से भारतीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वालों के अनुपात में लगातार गिरावट हो रही है तथा अंग्रेज़ी में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं। भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ने का मूल कारण हमारा अपनी भाषाओं के प्रति लगाव का कम होना है। यदि केवल पूर्वोत्तर की ही बात करें तो केवल पूर्वोत्तर में यह प्रतिशत 90 तक है। केवल असम में असमिया को अगर छोड़ दें यह प्रतिशत 100 तक पहुँच जाता है जो निश्चित ही चिंता का विषय है। आज हिंदी, संस्कृत, तमिल को छोड़कर अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए संस्थाओं की कमी पर चिंता ज़ाहिर की। उन्होंने आगे कहा अन्य विदेशी भाषाएं हमारी सहायक हो सकती हैं लेकिन हमारी भाषाओं की उद्धारक नहीं हो सकतीं।
संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. अम्बिका दत्त शर्मा, अध्यक्ष दर्शनशास्त्र विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर ने अपने वक्तव्य में कहा कि पाश्चात्य देशों में बड़ी भाषाओं के प्रभाव से छोटी भाषाएं विलुप्त हो जातीं हैं जबकि भारत में ऐसा नहीं है। भारत में हिंदी के विकास से भारतीय भाषाओं का उन्मूलन नहीं बल्कि विकास ही होता है। मातृभाषा के महत्ता को बताते हुए उहोंने कहा कि जो अपनी भाषा में नहीं है वह अपने घर में नहीं है। आजादी के बाद की कहानी हमारे अपने ही घर से बेघर होने की कथा है। डॉ. शर्मा के अनुसार किसी भाषा के विकास के तीन प्रमुख कारण राजनीतिक और सैन्य शक्ति की दृष्टि से, वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से तथा वाङ्मय की दृष्टि से माने जा सकते हैं। आगे उन्होंने कहा कि हमारा ऐतिहासिक बोध खो जाए, हम अपह्रत हो जाएं उससे पहले हमें जागने की आवश्यकता है।
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. जे.पी. सिंहल, कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर ने अपने वक्तव्य में कहा कि राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी हिंदी के विकास में बाधा रही है। राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर हिंदी को उस रूप में स्वीकार नहीं किया गया जिस रूप में किया जाना चाहिए था। अपनी भाषा के प्रति हीन भावना के कारण ही आज प्रांतीय भाषाओं की स्थिति अंग्रेजी की तुलना में खराब है। दासता की इस ग्रंथि को आज दूर किये जाने की आवश्यकता है। हिंदी को सरल बनाने की प्रक्रिया के तहत आज अंग्रेजी के शब्दों की बहुलता के कारण भविष्य में हिंदी नष्ट हो जाएगी, यह रूकना चाहिए।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष प्रो. विमल प्रसाद अग्रवाल, अध्यक्ष, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, नई दिल्ली ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि यदि भारतीय भाषाओं की लिपि देवनागरी हो जाए तो संभव है कि हम उन भाषाओं के शब्दों को सीख सकेंगे। भाषा व्यवहार से आती है, व्यवहार में लाने से भाषा का प्रसार होता है। हिंदी के प्रति हममें जो स्वाभिमान की कमी है, उसी के कारण आज यह स्थिति शोचनीय है। हमारी भाषा के प्रति हमारा स्वाभिमान बना रहना चाहिए। देश जागरण के लिए शिक्षा का माध्यम प्रांतीय भाषाएँ हों यह प्रयास किया जाना चाहिए।

संगोष्ठी के प्रथम/द्वितीय सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. मनोज सिन्हा, प्राचार्य, आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली तथा सत्र की अध्यक्षता प्रो. संतोष पाण्डेय, संपादक शैक्षिक मंथन, दिल्ली ने की। मुख्य अतिथि ने अपने वक्तव्य में अपने ग्रीस प्रवास के दौरान उन्होंने पाया कि पर्यावरण विषय से संबंधित जिस अनुसंधान के लिए वे आये हैं उस विषय की मूलभूत बातें हमारे वेदों से ली गई हैं। यह हमारी सांस्कृतिक व भाषाई संपन्नता को सिद्ध करता है।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. संतोष पाण्डेय, संपादक शैक्षिक मंथन, दिल्ली ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति, धरोहर एवं मूल्यों का विकास अपनी मातृभाषा द्वारा ही संभव है। अपनी भावना, परिवेश का चित्रण सिर्फ मातृभाषा से ही संभव है। संगोष्ठी के प्रथम एवं द्वितीय सत्र में डॉ. विवेकानन्द उपाध्याय, डॉ. विष्णु चतुर्वेदी, डॉ. सोनी जी, डॉ. भरत शर्मा ने आलेख वाचन किया।

धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के कुलसचिव डॉ. चंद्रकांत त्रिपाठी ने किया तथा उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. बीना शर्मा ने तथा प्रथम एवं द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. सपना गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर ने किया। इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. हरिशंकर, शैक्षिक समन्वयक हैं। संगोष्ठी में डॉ. लवकुश मिश्र, होटल एवं टूरिज्म मैनेजमेंट, खंदारी कैंपस, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, आगरा, प्रो. देवेंद्र शुक्ल, डॉ. कुसुम चतुर्वेदी, डॉ. प्रीति माहेश्वरी, डॉ. राजशंकर शर्मा, डॉ. अशोक मिश्र, प्रो. महेंद्र कपूर, प्रो. मोहिनी तिवारी, प्रो. महेंद्र कुमार, प्रो. अश्वनी श्रीवास्तव, श्री अनुपम श्रीवास्तव, श्री केशरी नंदन, डॉ. मुनीशा पाराशर, डॉ. आकाश भदौरिया आदि विद्वान उपस्थित रहे।

  • सूचना-पट

  • परिचय

  • विकास-यात्रा

  • विज़न 2021

  • फ़ोटो गैलरी

  • ओडियो-विजुअल गैलरी

  • आर.टी.आई.-2005

  • उपयोगी लिंक

  • डाउनलोड

सूचना-पट

नियमित अध्यापक शिक्षा पाठ्यक्रमों की प्रवेश-परीक्षा 2019-21 (नया)

अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 हेतु विवरणिका और सीट आवंटन सूची

संस्थान द्वारा प्रायोजित मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की अखिल भारतीय राजभाषा संगोष्ठी, पोर्ट ब्लेयर का प्रतिवेदन एवं फोटो अलबम

माननीय विदेश राज्यमंत्री जनरल (डॉ.) वी.के. सिंह (रिटा.) का संस्थान आगमन, नवनिर्मित भव्य प्रवेश द्वार : 'मोटूरि सत्यनारायण द्वार' का उद्घाटन एवं अं.हिं.शि. पाठ्यक्रम सत्र 2018-19 का शुभारंभ । प्रतिवेदनफोटो एलबम

हिंदी सौ रत्नमाला पुस्तक निर्माण श्रृंखला की द्वितीय कार्यशाला संपन्न। प्रतिवेदन । फोटो एलबम ।

सांध्यकालीन पाठ्यक्रम विभाग द्वारा संचालित सत्र 2017-18 के पाठ्यक्रमों के परीक्षा परिणाम (नया)

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में संस्थान की सहभागिता। (फोटो एलबम) 

साहित्य अकादमी और केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. नगेंद्र जन्म- 

       शतवार्षिकी समारोहएवं लेखक से भेंट कार्यक्रम
परिचय
  • केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के उच्चतर विभाग द्वारा 1960 ई. में स्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित शिक्षण संस्था है। संस्थान मुख्यतः हिंदी के अखिल भारतीय शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए कार्य-योजनाओं का संचालन करता है।
  • संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है। इसके आठ केंद्र दिल्ली (स्था. 1970), हैदराबाद (स्था. 1976), गुवाहाटी (स्था. 1978), शिलांग (स्था. 1987), मैसूर (स्था. 1988), दीमापुर (स्था. 2003), भुवनेश्‍वर (स्था. 2003) तथा अहमदाबाद (स्था. 2006) में सक्रिय हैं।

और..

विकास यात्रा

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना सन् 1960 में हुई थी। तब से आज तक लगातार मंडल द्वारा निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के अनुपालन में संस्थान हिंदी के शैक्षणिक विकास, बहुआयामी अनुसंधान और प्रचार-प्रसार के लिए अपनी गतिविधियों को विस्तार देता रहा है। पाँच दशकों से अधिक लंबी इस विकास-यात्रा के उल्लेखनीय पड़ावों की जानकारी इस खंड में बिंदुवार प्रस्तुत की जा रही है।

...और

विज़न 2021
  • आधुनिकतम संचार माध्यमों और सूचना प्रौद्योगिकी का हिंदी भाषा शिक्षण और दूर शिक्षा के लिए अधिकाधिक प्रयोग
  • यूनिकोड का व्यापक प्रचार और प्रसार
  • एक विशाल पोर्टल और बहुभाषी वेबसाइट
  • पॉप्युलर कल्चर के महत्त्व का रेखांकन, फ़िल्म लोक-नाट्य, कविसम्मेलन और मुशायरे
  • हिंदी की बोलियों का संरक्षण हो तथा देश-विदेश में नए केंद्रों की स्थापना
  • देश-विदेश के हिंदी के प्रख्यात साहित्य शिल्पियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर फ़िल्में बनाई जाएं
  • विश्व भर की संस्थाओं और विश्वविद्यालयों से सकर्मक जुड़ाव
  • मानकीकृत पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन
  • विश्व के महान साहित्यिक कृतियों और ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथों का हिंदी अनुवाद
  • जिन संस्थाओं के पास साधनों का अभाव है, हिंदी के विकास के लिए उनकी मदद

और..

फ़ोटो गैलरी

संस्थान की विविध गतिविधियों से संबंधित छवियों का विस्तृत संग्रह

नई गतिविधियाँ

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस-2017 

मा.सं.वि. मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक (22.05.2017)

और...

ओडियो-विजुअल गैलरी

Hindi-Sevi-Samman-2010-11-thumb

हिंदी सेवी सम्मान (वर्ष 2010 एवं 2011)

हिंदी सेवी सम्मान 2008-09

हिंदी सेवी सम्मान (वर्ष 2008 एवं 2009)

स्वर्ण जयंती वीडियो

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्वर्ण जयंती

उपयोगी लिंक

हिंदी शिक्षण, हिंदी भाषा संसाधन और संवर्धन से जुड़ी उपयोगी सूचना एवं जानकारियों से जुड़ी वेबसाइटों और वेब-पोर्टलों के लिंक।

और...