रविवार, सित 24

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“ हम दुनिया को आचार्य अभिनव गुप्त वाला कश्मीर दिखाना चाहते हैं, आज का कश्मीर नहीं। शंकराचार्य और अभिनव गुप्त दोनों ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता के संवाद को आगे बढ़ाने वाले हैं ”, यह विचार है संगोष्ठी के उदघाटन सत्र के मुख्य वक्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री जवाहरलाल कौल के। वे केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में "आचार्य अभिनव गुप्त का हिंदी साहित्य पर प्रभाव" विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

संगोष्ठी की विशिष्ट अतिथि जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली से पधारी डॉ. अद्वैतवादिनी कौल थीं। अध्यक्षता संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने की।
संगोष्ठी का प्रारंभ अद्वैतवादिनी जी द्वारा सरस्वती वंदना से हुआ। तदुपरांत मुख्य अतिथि तथा अध्यक्ष जी के द्वारा माँ सरस्वती का माल्यार्पण किया गया। संस्थान के कुलसचिव डॉ. चंद्रकांत त्रिपाठी ने मुख्य अतिथि तथा डॉ. सपना गुप्ताजी ने विशिष्ट अतिथि जी का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
शुरुआत में जवाहर लाल कौल जी ने विस्तार से बताया कि एक हजार साल बाद भी हम अभिनव गुप्त को क्यों याद कर रहे हैं? उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति का बखान किताबों में तो बहुत है पर लोगों तक पहुँचा नहीं। उन्होंने कहा कि आज भारतीय संस्कृति और सभ्यता में एक तरह का विचलन, एक प्रकार का अनिश्चय दिखाई देता है। उन्होंने प्रत्यभिज्ञा के बारे में भी बात की प्रत्यभिज्ञा का अर्थ होता है पहचान। अपना बात को वर्तमान परिदृश्य से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि यह अभिनव गुप्त पहचानने का समय है। जिस सभ्यता और संस्कृति का गुणगान हम पूरे विश्व में करते हैं उसे पहचानने की, अर्थात् उसकी प्रत्यभिज्ञा की आवश्यकता है।
उद्घाटन सत्र के बीज वक्तव्य में डॉ. अद्वैतवादिनी ने कहा कि परात्रिसिका और तंत्रालोक ग्रंथों के बारे में बताया। उन्होंने यह भी कहा कि आचार्य अभिनव गुप्त भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण और बड़े व्याख्याता रहे हैं तथा यह भी कहा कि भारतीय काव्य शास्त्र को विद्यालयी स्तर पर बच्चों को पढ़ाना चाहिए जिससे कि भारतीय काव्य शास्त्र के आचार्यों के बारे में हमारी नई पीढ़ी परिचय प्राप्त कर सके।
उद्घाटन सत्र के अध्यक्षीय भाषण में संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने अभिनव गुप्त के बारे में कहा कि हम उनमें अपना आदर्श ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अभिनव जी ने लगभग 40 ग्रंथ लिखे हैं जिनमें से 20 ग्रंथ ही प्राप्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारत का प्राकृतिक दर्शन केवल कश्मीर में ही देखने को मिल सकता है। अभिनव जी के सान्निध्य में लल्लेश्वरी जैसी महान साहित्यकार का उदय हुआ। अभिनव जी के कुछ ग्रंथ केरल में भी पाये गए हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि केरल के लोग भी उनसे जुड़े हुए हैं जबकि कश्मीर और केरल एक दूसरे के विपरीत माने जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर की परंपरा में जो तत्व चिंतन है वह कहीं लुप्त हो गया है। शंकराचार्य के 250 साल बाद अभिनव गुप्त वहाँ गये थे।
अभिनव गुप्त के बारे में उन्होंने कहा कि अभिनव गुप्त को विद्यार्थी भरत के रससूत्र के व्याख्याता के रूप में ही जानते हैं लेकिन अभिनव गुप्त के मत से शास्त्रार्थ समाप्त होते थे। अभिनव गुप्त ने अपना मत दे दिया तो शास्त्रार्थ पूर्ण माना जाता था। फिर उन्होंने आधुनिक साहित्य में जयशंकर प्रसाद के कामायनी और प्रत्यभिज्ञा दर्शन के संबंध में विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि समस्त मानवता की चिंता केवल भारतीय परंपरा की चिंताधारा से उभरती है जो कामायनी में दिखाई देता है। उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि अभिनव कि प्रत्यभिज्ञा रामानंद और तुलसी के काव्य में भी दिखाई देती है। उन्होंने सौंदर्य शास्त्र एवं संगीत शास्त्र में भी अभिनव गुप्त के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने स्त्रोत्र परंपरा का भी उल्लेख किया, कहा कि स्त्रोत्र परंपरा शंकराचार्य, अभिनव गुप्त से होती हुई मधुसूदन सरस्वती, तुलसी दास से भक्ति साहित्य में आई। भारत का समस्त बौद्धिक जगत अभिनव की छाया में है। अंत में उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्थान जहाँ अनेक देशों के विद्यार्थी पढ़ते हैं और साथ ही हिंदीतर प्रांतों के छात्र पढ़ते हैं वहाँ अभिनव पर चर्चा महत्वपूर्ण है। सहस्राब्दी वर्ष में यह संगोष्ठी अभिनव गुप्त के प्रति श्रद्धा सुमन है।
उद्घाटन सत्र के कार्यक्रम का संचालन प्रो. देवेंद्र शुक्ल जी ने किया।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता संस्थान के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. रामवीर सिंह ने की। इस सत्र के प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. राजनारायण शुक्ल, एसोसिएट प्रोफेसर एस.डी.पी.जी. कॉलेज, गाजियाबाद ने “अभिनव गुप्त, कामायनी और प्रत्यभिज्ञा दर्शन” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि हम अपने आप को भूलते जा रहे हैं। जिस प्रकार एक बाज मुर्गियों के बीच में पलने से उड़ना भूल जाता है ठीक उसी प्रकार हम अपने अंदर की शिव शक्ति को पहचान नहीं पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभिनव के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समझने का प्रयास कर रहे हैं। अभिनव गुप्त ने अनेक मतों, परंपराओं से शिक्षा ग्रहण की लेकिन उन्होंने प्रत्यभिज्ञा दर्शन को आगे बढ़ाया। उन्होंने आगे कहा कि अभिनव गुप्त को जयशंकर प्रसाद के कारण भी जाना जाता है। जयशंकर प्रसाद के समय अनेक दर्शन प्रचलित थे लेकिन उन्होंने कामायनी में प्रत्यभिज्ञा दर्शन को अपनाया जबकि उस समय प्रत्यभिज्ञा दर्शन उतना प्रसिद्ध नहीं था। प्रत्यभिज्ञा दर्शन भेद को मिटाता है। यह अभेदवाद पर आधारित है। इसमें ईश्वर-मनुष्य में अभेद, मनुष्य-मनुष्य में अभेद देखने को मिलता है। इसमें समरसता होती है। अभिनव ने 1000 वर्ष पहले अपने समय में यही बात कही थी जिसे जयशंकर प्रसाद कामायनी में लेकर आये।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली के डॉ. मयंक शेखर ने अपने विचार व्यक्त किए कि अभिनव जी ने अपने ग्रंथों में लिखा है कि शिल्प दो प्रकार के होते हैं। पहला देव शिल्प, जो मानव व जीव हैं। तथा दूसरी मानव शिल्प, जिसे हम देखकर बनाते हैं। उन्होंने अभिनव भारतीय में लिखा है कि शुभ कर्म करने वाले को शुभफल तथा अशुभ कर्म करने वाले को अशुभफल की प्राप्ति होती है।
प्रथम सत्र के अगले वक्ता के रूप में डॉ. श्वेता सत्यम, असिस्टेंट प्रोफेसर, दौलतराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि मानव जीवन की समस्याओं की जड़ में उसकी मानसिक अवस्था होती है। साथ ही यह भी कहा कि अभिनव के दर्शन में विश्व के सभी दर्शन समाहित हो जाते हैं। पाश्चात्य जगत में आत्मा, प्रकृति और मनोविज्ञान को आज जानने की कोशिश की जा रही है, उसे अभिनव गुप्त एक हजार वर्ष पहले बताकर चले गये। उन्होंने ध्वनि के संबंध में भी अपने विचार व्यक्त किए और कहा कि ध्वनि का मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है। उन्होंने नई पीढ़ी को आह्वान किया कि अभिनव गुप्त के दर्शन को अपने जीवन में अपनाएँ, उसके दर्शन को पढ़े, समझें और अपने जीवन में उतारें।
प्रथम सत्र के अध्यक्षीय भाषण में प्रो. रामवीर सिंह जी ने सभी वक्ताओं को धन्यवाद देते हुए कहा कि सभी ने अपने विषय से संबंधित गंभीर चिंतन किया है। आगे उन्होंने यह भी कहा कि दर्शन और साहित्य दोनों ही चिंतन की परिधि से घिरे रहते हैं। दर्शन, साहित्य, समाज अलग-अलग होते हुए भी इनमें एक जुड़ाव रहता है। आगे यह भी कहा कि हमारे आचार्यों ने हमें एक अच्छा दर्शन दिया लेकिन हम उस दर्शन पर आगे न बढ़ सके। हम अलग-अलग हिस्सों में बँटे रहे। एकता और समरसता की भावना अपने अंदर नहीं जगा पाए।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. परमलाल अहिरवाल, केंद्रीय हिंदी संस्थान ने की। प्रथम वक्ता के रूप में श्री मणिशंकर द्विवेदी, शोध छात्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली ने अपने विचार “अभिनव गुप्त पर आधारित गुरु तत्व का शोध” विषय पर व्यक्त किए। इन्होंने कश्मीरी शैव दर्शन के बारे में बताया तथा तीन शास्त्र बताए। आगम शास्त्र तथा निगम शास्त्र के बारे में व्याख्या की। शैव दर्शन के गुरु शिव को बताया। परम शिव के दो रूप बताए- भैरव और भैरवी, शिव और पार्वती। उन्होंने बताया अगर शास्त्र का ज्ञान नहीं होगा तो वह शास्त्र अर्थ का अनर्थ कर देगा।
द्वितीय सत्र के दूसरे वक्ता के रूप में शिखा पुरोहित जी ने अपने विचार व्यक्त किए। अभिनव गुप्त जी को 44 ग्रंथों का स्रोत व्यक्त किया। इन्होंने गीता संग्रह की व्याख्या की। अभिनव गुप्त ने शैव-सिद्धांत की व्याख्या की। गीता का कश्मीरी संस्करण किया। अभिनव गुप्त संस्कार की प्रकृति को क्रीड़ा शास्त्र कहते हैं। इसलिए उन्होंने शिव तत्व को महत्वपूर्ण माना है।
द्वितीय सत्र के अगले वक्ता के रूप में शोध छात्र श्री वशिष्ठ बहुगुणा, जे.एन.यू., ने अभिनव गुप्त के विषय में कला की दार्शनिक दृष्टि पर अपने विचार व्यक्त किए।
द्वितीय सत्र के शोध छात्रा निधि त्रिपाठी ने ‘वाच्यार्थ में आनन्त (लोचन के विशेष संदर्भ में)’ विषय पर अपना विचार व्यक्त किए।
सत्र के अगले वक्ता के रूप में श्री उत्पल कौल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कश्मीरी पंडितो में त्याग नहीं करते। गृहस्थ जीवन जीते हैं।
संगोष्ठी के अंत में सत्र के अध्यक्ष प्रो. परमलाल अहिरवाल ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने सभी वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. हरि शंकर और सह संयोजक केशरी नंदन एवं अनुपम श्रीवास्तव थे। सत्र का संचालन डॉ. सपना गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने किया।
संगोष्ठी में प्रो. महेंद्र सिंह राणा, प्रो. बीना शर्मा, डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी, डॉ. गंगाधर वानोडे, डॉ. जोगेंद्र सिंह मीणा, शालिनी श्रीवास्तव, डॉ. आकाश भदौरिया, डॉ. दिग्विजय शर्मा, डॉ. मघुरिमा शर्मा आदि की उपस्थिति रही।

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स्नातकोत्तर जनसंचार एवं हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम सत्र 2017-18 की प्रवेश परीक्षा हेतु योग्य अभ्यर्थियों की सूची (नया)

केंद्रीय हिंदी संस्थान में स्वच्छता पखवाड़ा - 2017 सफलतापूर्वक संपन्न

सांध्यकालीन पाठ्यक्रम सत्र 2017-18 में प्रवेश हेतु अधिसूचना (आवेदन पत्र) (पाठ्यक्रम विवरणिका) (विज्ञापन  आगरा) (विज्ञापन दिल्ली

संस्थान में उल्लास और उमंग के साथ मनाया गया स्वतंत्रता दिवस

माननीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री द्वारा संस्थान मुख्यालय का संदर्शन

दि. 10.08.2017 को भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, कोलंबो (श्रीलंका) के हिंदी अध्यापकों के लिए आयोजित विशेष पुनश्चर्या कार्यक्रम का उद्घाटन

नियमित शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम वर्ष 2017-2018 की तृतीय प्रवेश सूची (नया/ महत्वपूर्ण)

सांध्यकालीन पाठ्यक्रम, सत्र 2016-17 की वार्षिक परीक्षा के परिणाम (नया/ महत्वपूर्ण)

नियमित शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम वर्ष 2017-2018 की द्वितीय प्रवेश सूची (नया/ महत्वपूर्ण)

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नियमित शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के वार्षिक परीक्षा परिणाम (2016-17) (नया)

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हिंदी सेवी सम्मान समारोह - वर्ष 2015 का दिनांक 30 मई, 2017 को राष्ट्रपति भवन में संपन्न हुआ । (कार्यक्रम की रिपोर्ट) (फोटो एलबम)

हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2016 के लिए प्रस्ताव आमंत्रण (नई सूचना)

प्रवेश-परीक्षा 2017 हेतु चयनित योग्य अभ्यर्थियों की सूची (नई सूचना)

सूचना तथा भाषा-प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "भाषा-प्रौद्योगिकी और ई-शिक्षण (द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में हिंदी का संदर्भ)" का आयोजन संपन्न 

वर्ष 2015 के हिंदी सेवी सम्मान पुरस्कारों की घोषणा 

कें.हिं.सं. हैदराबाद केंद्र द्वारा आयोजित भव्य लोकार्पण समारोह में संस्थान की नई पत्रिका 'समन्वय दक्षिण' पत्रिका का शुभारंभ

अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण पाठ्यक्रम की प्रवेश सूचना सत्र : 2017-18

महत्वपूर्ण सूचनाः सत्र 2017-19 की प्रवेश परीक्षा तिथि में परिवर्तन

भारत सरकार के वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम (विसाका) के तहत संस्थान मुख्यालय में दि. 10.01.2016 को डिजिटल बैंकिंग एवं नकद रहित लेन-देन पर एक-दिवसीय कार्यशाला-सह-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन 

महत्वपूर्ण सूचना- कुलसचिव कार्यालय के लिए पत्राचार हेतु नया ई-मेल आई डी  यह ईमेल पता spambots से संरक्षित किया जा रहा है. आप जावास्क्रिप्ट यह देखने के सक्षम होना चाहिए.  

अध्यापक शिक्षा पाठ्यक्रम सत्र 2017-2019 हेतु प्रवेश अधिसूचना (विवरणिका भाग-1, भाग-2 एवं भाग-3) (आवेदन फॉर्म)

 

साहित्य अकादमी और केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. नगेंद्र जन्म- 

       शतवार्षिकी समारोहएवं लेखक से भेंट कार्यक्रम
परिचय
  • केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के उच्चतर विभाग द्वारा 1960 ई. में स्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित शिक्षण संस्था है। संस्थान मुख्यतः हिंदी के अखिल भारतीय शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए कार्य-योजनाओं का संचालन करता है।
  • संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है। इसके आठ केंद्र दिल्ली (स्था. 1970), हैदराबाद (स्था. 1976), गुवाहाटी (स्था. 1978), शिलांग (स्था. 1987), मैसूर (स्था. 1988), दीमापुर (स्था. 2003), भुवनेश्‍वर (स्था. 2003) तथा अहमदाबाद (स्था. 2006) में सक्रिय हैं।

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विकास यात्रा

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना सन् 1960 में हुई थी। तब से आज तक लगातार मंडल द्वारा निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के अनुपालन में संस्थान हिंदी के शैक्षणिक विकास, बहुआयामी अनुसंधान और प्रचार-प्रसार के लिए अपनी गतिविधियों को विस्तार देता रहा है। पाँच दशकों से अधिक लंबी इस विकास-यात्रा के उल्लेखनीय पड़ावों की जानकारी इस खंड में बिंदुवार प्रस्तुत की जा रही है।

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  • पॉप्युलर कल्चर के महत्त्व का रेखांकन, फ़िल्म लोक-नाट्य, कविसम्मेलन और मुशायरे
  • हिंदी की बोलियों का संरक्षण हो तथा देश-विदेश में नए केंद्रों की स्थापना
  • देश-विदेश के हिंदी के प्रख्यात साहित्य शिल्पियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर फ़िल्में बनाई जाएं
  • विश्व भर की संस्थाओं और विश्वविद्यालयों से सकर्मक जुड़ाव
  • मानकीकृत पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन
  • विश्व के महान साहित्यिक कृतियों और ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथों का हिंदी अनुवाद
  • जिन संस्थाओं के पास साधनों का अभाव है, हिंदी के विकास के लिए उनकी मदद

और..

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस-2017 

मा.सं.वि. मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक (22.05.2017)

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Hindi-Sevi-Samman-2010-11-thumb

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